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सबसे बड़ा दर्द और कई मृत्युदण्ड की सज़ा

Posted On: 2 Jan, 2014 Others,social issues,Contest,Hindi Sahitya में

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लघु कथा :

सबसे बड़ा दर्द और कई मृत्युदण्ड की सज़ा


जंगल की जनता अँधेरे और खौफ़ से परेशान थी| आए दिन कोई न कोई बुरी घटना होती| बलात्कार तो जैसे उस जंगल की नियति हो गई हो| छोटे-छोटे मेमने, शावक, बछेड़ियाँ तक बलात्कार का शिकार हो रहे थे| मौत की सज़ा के बाद भी बलात्कार की घटनाएँ रुक नहीं रहीं थीं| हर कोई परेशान–- चूहे, चींटियाँ, हाथी, गधे  सभी चिंतित थे| इसी समस्या को लेकर जंगल की सभा में बहस चल रही थी| लकड़बग्घे,  तेंदुए,  अजगर  सभी के नुमाइंदे सभा में मौजूद थे| भेड़ें, बकरियाँ,  ख़रगोश, हिरन सब के प्रतिनिधि बुलाये गए थे| मगर कोई कारगर उपाय किसी की समझ में नहीं आ रहा था| तभी सभा में भगदड़ मच गई| तीनों बन्दर अपने आचार और सयंम का उल्लघंन करते हुए उछल-कूद करने लगे| हर कोई हक्का-बक्का, सारे सभासद अचंभित| सिंहराज की तो त्योरियाँ चढ़ गईं|


“मेरे बंदरो..S! शांत हो जाओ, नहीं तो तुम्हारे सर कलम कर दिए जाएँगे|”                                


“क्षमा कीजिए महाराज! माननीय वक्ता बलात्कारियों के लिए सही सज़ा का निर्धारण नहीं कर पा रहे थे| आप  के मृत्युदंड के आदेश से आख़िर क्या हुआ? इधर बलात्कार की घटनाएँ और बढ़ गई हैं|”


“हाँ, लेकिन तुम तीनों को कुछ कहने, सुनने और बोलने की इजाज़त कहाँ है?”


“महाराज! हम तीनों आप के मनोनीत बन्दर हैं और जनता के विश्वसनीय प्रतिनिधि| हम हमेशा राजदरबार में माटी की मूरत की तरह बैठते हैं| हम में से एक अपनी आँखों को दोनों हाथों से बंद किए रहता है,  दूसरा अपने कानों को और तीसरा अपने मुँह पर दोनों हाथ रखे रहता है| इसलिए हम कई मृत्यु और जन्म-जन्मान्तर का दर्द एक साथ झेलते हैं| लेकिन बलात्कार-पीड़िता का दर्द सबसे बड़ा होता है| आज हमें बोलने से न रोका जाए|”



“अच्छा, ठीक है, बोलो..S,  क्या कहना चाहते हो?”


“यही कि बलात्कारी को एक साथ कई मृत्युदण्ड दिया जाना चाहिए, तभी बलात्कार-जैसे कुकर्म पर क़ाबू पाया जा सकेगा|”


“ओह..S, एक साथ कई मृत्युदंड! लेकिन इससे तुम्हारा आशय क्या है? किसी को एक साथ कई मृत्युदण्ड कैसे दिया जा सकता है?”


“महाराज! बलात्कारी के लिए एक साथ कई मृत्युदण्ड की सज़ा यही है कि उसके जननांग को जड़ से काट दिया जाए| उसके अंग, काम-वासना और वंश-रेखा का अंत कई मृत्युदण्ड के बराबर होगा|”


.. और फिर सभा ने ध्वनिमत से प्रस्ताव पारित कर दिया|



– संतलाल करुण

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
January 5, 2014

आदरणीय करुण जी , सादर अभिवादन !एक ज़रूरी सन्देश देती लघुकथा के लिए हार्दिक आभार ! ऐसा अगर हो जाए तो बलात्कारियो की रूहें काँप जाएँगी पर ऐसा होगा भी क्या? फिर उन नियामक – नियंताओं का क्या होगा ? बहुत-बहुत बधाई !!

    Santlal Karun के द्वारा
    January 8, 2014

    आदरणीय विजय गुंजन जी, लघुकथा आप को पसंद आई और आप के शब्दों ने बहुत संबल दिया; सहृदय आभार !

jlsingh के द्वारा
January 4, 2014

श्रद्धेय महोदय, अरब देशों में शायद यह कानून लागू है इसलिए वहाँ इस प्रकार की घटनाएं कम पायी जाती है पर भारत में जितना भी कड़ा कानून हो … उसका फैसला और क्रियान्वयन होने में ही सैलून लग जाते है तबतक घटनाएं बढ़ती ही जाती है उस पर लगाम लगाने के लिए हर सम्भव प्रयास होने चाहिए या फिर त्वरित न्याय …सर कलम या अंग कलम…सादर!

    Santlal Karun के द्वारा
    January 8, 2014

    आदरणीय जे.एल. सिंह जी, आख़िरी स्टेज में पहुँचे कैंसर नुमा नीच-पापियों के लिए कोई भी सुधारात्मक सज़ा कारगर नहीं हो सकती | समर्थित प्रतिक्रिया के लिए बहुत-बहुत आभार !

January 4, 2014

आदरणीय अभिवादन मैँ आपसे पूर्णतया सहमत हूँ । आपके द्वारा बतायी गयी सजा बिल्कुल उचित है ।

    Santlal Karun के द्वारा
    January 8, 2014

    आदरणीय चित्र्कुमार जी, आप की समर्थन भरी प्रतिक्रिया पर सहृदय आभार !

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
January 4, 2014

परम श्रद्देय ,ब्लॉग सिरोमणी जी सादर अभिवादन ,मनुष्य आदिम था तब जानवरों  की तरह बलात्कारी था ,आर्य बना तो बलात्कारी ही रहा अब  आधुनिक  है तब भी बलात्कारी ही है बल यानि शक्ति  मनुष्य को शक्ति  प्रयोग को प्रोत्साहित करती ही है चाहे वह मेल हो या फेमेल |सब कुदरत का खेल ही है ,समाज सुधारने के प्रयोग होते ही रहते हैं ॐ शांति शांति शांति

    Santlal Karun के द्वारा
    January 8, 2014

    आदरणीय हरीश जी , मनुष्यों में बलात्कार को कुदरत का खेल मानकर हलके में लेना ठीक नहीं | ब्लॉग पर आने और प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
January 3, 2014

आदरणीय संतलाल करुणजी,आश्चर्यजनक रचना.पहली बार मैंने एक अनोखी लघुकथा पढ़ी है.लेखन में नए प्रयोग करने के लिए बधाई.यहाँ एक समस्या भी है कि बलात्कारी यदि पुरुष न होकर कोई महिला हो तब क्या होगा ?इस कटु सत्य को अपने जीवन मैंने महसूस किया है कि महिलाएं भी बलात्कार करती हैं,लेकिन उसकी चर्चा नहीं होती है और समाज में हमेशा पुरुषों को ही बलात्कार का दोषी ठहराया जाता है.आपके लघुकथा की विशेष पंक्तियाँ-हम तीनों आप के मनोनीत बन्दर हैं और जनता के विश्वसनीय प्रतिनिधि| हम हमेशा राजदरबार में माटी की मूरत की तरह बैठते हैं| हम में से एक अपनी आँखों को दोनों हाथों से बंद किए रहता है, दूसरा अपने कानों को और तीसरा अपने मुँह पर दोनों हाथ रखे रहता है|एक बार पुन: बधाई.

    Santlal Karun के द्वारा
    January 3, 2014

    आदरणीय सद्गुरु जी, ब्लॉग पर आने और प्रसंशा भरी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार ! जहाँ तक आप का प्रश्न है, तो नारी द्वारा बलात्कार की चर्चाएँ सुनने में आती रही हैं, पर इस प्रसंग में मेरा मत कुछ भिन्न है | कामशास्त्र और मनोविज्ञान दोनों दृष्टियों से नारी पुरुष की अपेक्षा स्थिर होती है | कानून की दृष्टि में बहलाना, फुसलाना, बरगलाना अपराध हो सकता है, किन्तु ऐसी परिस्थितियों से प्रभावित होकर उम्र के हिसाब से सक्षम नारी के जननांग सहवास के लिए तैयार हो सकते हैं | ऐसे मामले में थोड़ी देर के लिए क़ानून से हटकर कामासक्त नर-नारी का सम्मेल बलात्कार नहीं हो सकता | यही बात पुरुष पर भी लागू होती है, परिस्थितियाँ बुनकर यदि कोई नारी किसी पुरुष को उत्तेजित करने में सफल हो जाती है और सहवास करती है, तो उसे बलात्कार कैसे कहा जा सकता है ? नारी के प्रमुख जननांग सपाट होते हैं, बिना शरीर के तैयार हुए पुरुष द्वारा बलपूर्वक प्रयासों से उसे गुप्तांग के छिन्न-भिन्न हो जाने तथा असह्य शारीरिक-मानसिक-आत्मिक पीड़ा से गुजरना पड़ता है, जबकि पुरुष बिना लिंगोत्थान के सहवास कर ही नहीं सकता | इसलिए अंत: या बाह्य किसी भी प्रभाव से पुरुष में लिंगोत्थान का आना उसके द्वारा सम्भोग के लिए तैयारी का परिचायक है, फिर उसे कोई पीड़ा नहीं होगी, उलटे शारीरिक आनंद की स्थिति में बलात्कार कैसा ? हाँ, अनर्गल संबंधों में बाद में मानसिक क्षोभ हो सकता है, किन्तु सम्भोगेच्छा और लिंगोत्थान के उपरान्त नारी द्वारा कराए गए यौनिक संपर्क को बलात्कार कहना उचित नहीं | वैचारिकता के लिए हार्दिक साधुवाद !


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