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जागरण जंक्शन का वैशिष्ट्य और उसके दशानन

Posted On: 7 Jan, 2014 social issues,Contest,Hindi Sahitya,Others में

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आलोचना :

जागरण जंक्शन का वैशिष्ट्य और उसके दशानन


जब ब्लॉग स्पॉट, ट्वीटर, वर्ड प्रेस्, टाइप पैड, फ्रेंड फीड, फ़ेस बुक, माई स्पेस, लाइव जर्नल, आदि अपने-अपने ढंग से लॉग-इन, ब्लॉगिंग की सुविधाएँ लेकर सामने आए और लोगों ने इन पर अपनी आमद दर्ज की, तो इस क्षेत्र में कुछ संस्थाओं द्वारा विशिष्टता के साथ व्यावहारिक होना अप्रत्याशित नहीं था | फलत: एनबीटी ब्लॉग, रचनाकार, गद्य कोश, कविता कोश, ओबीओ आदि नेटवर्क-माध्यम के ऐसे सशक्त मंचों का उद्भव हुआ, जो आज देवनागरी लिपि में हिन्दी वैचारिकता को पूरी तत्परता के साथ विश्व-पटल पर रखने में सक्षम हैं | जागरण जंक्शन उनमें से एक ऐसा मंच है,  जो ब्लॉगर को ऐसी स्वतंत्रता प्रदान करता है, जैसा कि अन्यत्र दुर्लभ है | अन्य मंचों की सामग्री जहाँ नपी-तुली,  निखरी,  शान पर चढ़ाई हुई और अच्छी तरह देखी-भाली हुई होती है,  वहीं इस मंच की सामग्री अपनी तद्भवी नवीनता,  तात्कालिक उपस्थिति,  बेलाग विचार-प्रवाह और अल्हड़पन के रूप-स्वरूप में उन्मुख होती है | इस मंच की ऐसी स्वतंत्रता इसकी श्रेष्ठता भी है और हीनता भी | यद्यपि समय-समय पर सम्पादक-मंडल द्वारा निर्देश दिए जाते हैं, किन्तु फिर भी स्वतंत्रता का छिट-पुट दुरुपयोग प्रकाश में आता है | इस तरह की स्वतंत्रता से सामग्री का स्तर भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहता | तब भी जागरण जंक्शन पर श्रेष्ठ ब्लॉगरों की कमी नहीं है और उसकी लोकप्रियता दिनोंदिन बढ़ती जा रही है |

जागरण जंक्शन एक प्रभावशाली मंच के रूप में कार्य करता है,  किन्तु इसका हमेशा के लिए मात्र अभ्यास-मंच बने रहना ठीक नहीं है | इसकी प्रतिभाओं का ब्लॉगिंग कोटर से निकलकर बाहर सामाजिक परिदृश्य में उजागर होना भी अपेक्षित है | ऐसा तभी हो सकता है जब ब्लॉग-लेखक कथ्य और शिल्प दोनों दृष्टियों से सशक्त प्रदर्शन करने में सक्षम हों | ऐसा भी लगता है कि दैनिक जागरण अपने ब्लॉग पोर्टल का इस्तेमाल दैनिक पत्र की पाठक-संख्या बढ़ाने के लिए करता है | वर्तमान मीडिया में परस्पर स्पर्धा और उसके बाज़ार-तंत्र को देखते हुए ऐसा करना अनुचित नहीं है | किन्तु जागरण जंक्शन के ब्लॉगरों को निम्न स्तरीय वामपंथी मान कर उनके प्रति हीन दृष्टि वाला व्यवहार भी उचित नहीं | परिहासपरक अभिप्राय यह कि दैनिक जागरण ब्लॉग संबंधी उत्कृष्ट आलेखों को अपने सम्पादकीय पृष्ठ पर निम्न स्तरीय ( नीचे की ओर ) वामपंथी ( बाएँ कोने पर स्थित कॉलम में ) संक्षिप्त स्थान देकर अपने दायित्व की इतिश्री मान लेता है | जबकि वासुदेव त्रिपाठी-जैसे ब्लॉग-लेखक बिना किसी सम्पादन-श्रम के सम्पादकीय पृष्ठ के प्रमुख लेखों की जगह स्थान पाने की प्रतिभा रखते हैं | ऐसा प्रकाशन भी कभी-कभी होना चाहिए, परन्तु ऐसा एक भी उदाहरण नहीं है कि ब्लॉगरों के लेखन को विस्तृत रूप में छापकर आगे बढ़ने में प्रोत्साहित किया गया हो |

इधर सद्गुरुजी ने कई किस्तों में अपनी प्रेम-कथा और जीवन-संघर्ष के रेखांकन से सब का ध्यान आकृष्ट किया है | उन्होंने प्रेम-प्रसंगों के आरंभिक जीवन-प्रवाह को बड़े रोचक रूप में कहा तो है, किन्तु जिस प्रकार अनुभुक्त और ठोस सामग्री उनके पास है,  उस प्रकार अनुभूति की शिथिल सम्प्रेषणीयता के कारण वे सफल नहीं हो पाए हैं | ब्लॉग पर कच्ची अवस्था में तड़ातड़ पोस्ट डालते जाने की त्वरा ने एक महत्तवपूर्ण रचनात्मकता के प्रभाव को कम कर दिया है,  जिसमें पुनर्लेखन का पर्याप्त अवकाश है | सद्गुरुजी-जैसे आत्म-कथा शिल्पियों को डॉ. हरिवंश राय बच्चन की चार खण्डों में विस्तृत आत्म-कथा,  अज्ञेय के उपन्यास ‘शेखर एक जीवनी’  और धर्मवीर भारती के उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’-जैसी कृतियों का अध्ययन अवश्य करना चाहिए |

इस मंच पर ब्लॉग और पोस्ट का आधिक्य इतना भारी-भरकम है कि सबसे होकर गुज़रना और सब पर समालोचनात्मक दृष्टि डालना अत्यंत कठिन है | जो ब्लॉगर बार-बार दृष्टि पर चढ़ते हैं और ब्लॉगिंग परिक्षेत्र की सुदीर्घता के उपरान्त ध्यान आकृष्ट करते हैं,  उनमें सर्वश्री  ए.के. रक्ताले, चातक,  तमन्ना,  मनोरंजन ठाकुर, आ.एन. शाही,  दिनेश आस्तिक,  रेखा एफ.डी, रोशनी, विनीता शुक्ला, डॉ. सूर्य बाली ‘सूरज’,  निखिल पाण्डेय, पीयूष कुमार पन्त,  महिमा श्री,  मलिक प्रवीन, सोनम सैनी, रीता सिंह सर्जना, डॉ. आशुतोष शुक्ल, पापी हरीश चन्द्र, दीपा सिंह,  आशीष गोंडा,  आचार्य विजय गुंजन,  सुरेश शुक्ल ब्रह्मात्मज,  सुधा जयसवाल, डॉ. भूपेन्द्र, आनंद प्रवीण, सुषमा गुप्ता,  महा भूत,  पीताम्बर थक्वानी, मनीषा सिंह राघव, सीमा कँवल,  रचना वर्मा, भरोदिया, के.पी.सिंह गोराई, अजय यादव,  मोहिंदर कुमार,  उत्कर्ष सिंह,  प्रदीप कुशवाहा,  मदन मोहन सक्सेना, राजेश दुबे,  यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी,  सुषमा गुप्ता, भानु प्रकाश शर्मा,  फूल सिंह,  तौफेल ए. सिद्दीकी,  विद्या सुरेंदर पाल, अनुराग शर्मा, अलका,    अमन कुमार,  ओम दीक्षित,  संतोष कुमार,  मीनू झा, शालिनी कौशिक, वन्दना बरनवाल, सत्यशील अग्रवाल,  , भगवान बाबू,  उषा तनेजा,  अनामिका,  जयश्री,  अमरसिन,  उदयराज, सद्गुरुजी, अनिल कुमार ‘अलीन’, चित्र कुमार गुप्ता, संकल्प दुबे,  अक़बर महफ़ूज आलम, डॉ. एस. शंकर सिंह, राजेश काश्यप,  डॉ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर,  बृज किशोर, उषा तनेजा,  दीपक तिवारी,  सीमा सचदेव, रंजना गुप्ता, अनिल कुमार, डॉ. रामरक्षा मिश्र ‘विमल आदि उल्लेखनीय हैं  |

जागरण जंक्शन द्वारा लेटेस्ट, मोस्ट व्यूड, मोस्ट कमेंटेड और फीचर्ड तथा इसी प्रकार ज्यादा चर्चित, ज्यादा पठित और अधिमूल्यित संबंधी जो प्रचारात्मक एवं प्रोत्साहनपरक कॉलम प्रदर्शित किए जाते हैं, वे किसी सीमा तक ही ब्लॉग, ब्लॉगर और पोस्ट का मूल्यांकन करते हैं, उन्हें अंतिम मानक नहीं बनाया जा सकता | क्योंकि मोस्ट व्यूड में ‘रिश्तों की उधेड़बुन’, ‘लड़की पटाने के तरीके’, ‘कुछ गंदे चुटकुले लेकिन हँसना है तो पढ़ो’, ‘पुत्र प्राप्ति के सरल उपाय’-जैसे आलेखों की अधिकता है | ठीक वैसे, जैसे अखबारों में काम संबंधी दवाइयों और उपकरणों के विज्ञापन अधिक पढ़े जाते हैं | एक और उदाहरण शशिभूषण की 23 अगस्त 2013 को पोस्ट की गई बेहतरीन गेयात्मक कविता पर महज तीन टिप्पणियाँ उपलब्ध हैं | ऐसे में ब्लॉग और पोस्ट के सम्बन्ध में सटीक समालोचना मंचीय रेखांकनों से हटकर वस्तुपरक अध्ययन की माँग करती है | पोस्ट के अंत में ‘रेट दिस आर्टकिल’ का आंकड़ा भी आलोच्य परिधि से बाहर का विषय है |

इस प्रकार उपर्युक्त दृष्टिकोण तथा तथ्यों के आलोक में और अत्यंत सीमित प्रारूप में जागरण जंक्शन पर दशानन की खोज तो और भी दुष्कर कार्य है | गत वर्ष हमने किसी ब्लॉगर महानुभाव पर सुधारात्मक दृष्टिकोण से टिप्पणी कर दी थी, किन्तु तब प्रत्युत्तर में ऐसी टिप्पणी मिली कि मैनें कान पकड़ लिया था | यदि आचार्य शुक्ल ने गोस्वामी तुलसीदास और सूफी कवि मलिक मुहम्मद जायसी,  डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने संत कबीर तथा डॉ. नामवर सिंह ने नई कविता के सशक्त हस्ताक्षर मुक्तिबोध की आलोचना न की होती,  तो इन महान साहित्यकारों की विचारशीलता वैश्विक स्तर के ज्ञानवान मानस में कैसे स्थापित होती ?  इसलिए जोख़िम भरा दुस्साहस कर रहा हूँ और तमाम चेहरों में से जागरण जंकशन के दशानन को प्रतिमान के रूप में सामने लाने का विनम्र प्रयास कर रहा हूँ | इनमें किसी को छोटा-बड़ा कहना ‘को बड़ छोट कहत अपराधू’ के समान है | सभी श्रेष्ठ हैं और सब की अपनी विशिष्टता है | कोई अत्यधिक सक्रियता,  कोई तार्किक क्षमता,  कोई बेजोड़ प्रस्तुति,  कोई रोचकता,  कोई उदाहरण-उद्धरण सहित स्पस्टीकरण,  तो कोई भाषिक आकर्षण से अपनी पहचान बनाता है | यह भी कि पसंदीदा आलेखों को आधार बनाकर इनकी श्रेष्ठताओं को रेखांकित किया जा रहा है,  न कि इनकी कमियों को और यह भी कि अधिक श्रम और व्यापक अध्ययन से इनमें और नाम जोड़े जा सकते हैं |

प्रथम : वासुदेव त्रिपाठी

चयनित पोस्ट : हिन्दी का लैमार्कवादी विकास: राष्ट्रीय आत्मघात का एक अध्याय(1-2)

उत्कृष्टता : वासुदेव त्रिपाठी विचार,  भाषा और तथ्य की दृष्टि से अत्यंत सुदृढ़ लेखन के साथ सामने आते हैं | वे उदाहरणों,  सटीक प्रसंगों,  मानक आँकड़ों आदि के शोधपरक विवरण देते हुए अपने विचार पुष्ट करते चलते हैं | उनमें सधी हुई श्रेष्ठ लेखकीय क्षमता परिलक्षित होती है | राजनीति, समाज, भाषा आदि विषयों से जुड़ी विसंगतियों पर उनकी पैनी दृष्टि रहती है तथा तार्किक विश्लेषण व निष्कर्ष से वे अपने लेखों को विशिष्टता प्रदान करते हैं |

‘हिन्दी का लैमार्कवादी विकास: राष्ट्रीय आत्मघात का एक अध्याय(1-2)’ में भारत और उसकी प्रमुख वाणी हिन्दी के पारस्परिक संबंधों की आधार-भूमि में सांस्कृतिक पतन का मौलिक रेखांकन किया गया है | भाषागत पतन के पीछे छिपी सूक्ष्म मानसिकता को बड़ी पैनी दृष्टि से पहचाना और उजागर किया है | विस्तृत लेख दो भागों में है तथा गम्भीरता के साथ पढ़ने की अपेक्षा रखता है |

द्वितीय : शशिभूषण

चयनित पोस्ट : आतंकवादी अंकल को चिठ्ठी !

उत्कृष्टता : शशिभूषण समय के कंगूरे पर खड़े, ओजस्वी स्वर के धनी गीतकार  हैं | इनके यहाँ गेयात्मकता छंद विधान के साथ सुगठित रूप में शब्द की सवारी करती है | प्रत्येक गीत सामयिक चेहरा लिए हुए होता है और व्यंजित भावानुभाव में आम जनता की संवेदना समाई होती है |

‘आतंकवादी अंकल को चिठ्ठी !’-जैसी गीतातमक कविता आतंकवाद के प्रति मार्मिक भावनाओं का सम्प्रेषण प्रस्तुत करती है | आतंकवाद की निर्मम और बूचड़खाने-सरीखी हृदयहीनता से नन्हें, भोले-भाले बच्चों की कोमल भावनाओं के माध्यम से आया विस्तृत संलाप कुछ अत्यंत आवश्यक और मर्मस्पर्शी प्रश्नों को उकेरता है और क्रूरता को मानवता के पक्ष में सोचने के लिए प्रयास करता है –

“किस कारन खून बहाते हो, वह लिख कर हमको बतलाना !

जब बड़े बनेंगे हम आकर, वह चीज हमीं से ले जाना !

हीरा-मोती,  सोना-चाँदी,  जो भी चाहोगे दे देंगे !

पर आज खेलने-पढ़ने दो,  उस दिन जो चाहो ले देंगे !

इतनी सी विनती है अंकल,  आशा है इसे मान लोगे !

वह हँसी हमारे अधरों की,  लौटेगी अगर ध्यान दोगे !

हम तुमसे कुट्टी कर लेंगे,  जो बात नहीं मानी सुन लो !

अथवा जीने दो ख़ुशी-ख़ुशी,  दो में से एक तुम्हीं चुन लो !”

तृतीय : सरिता सिन्हा

चयनित पोस्ट : निकलो न बेनक़ाब

उत्कृष्टता : सरिता सिन्हा जैविक-सामाजिक तंतुओं की सूक्ष्म अध्येता-दृष्टि लिए विचार-प्रवाह में पूरे मनोयोग और आनंद के साथ शब्दानुशासन करती हैं | वे अछूते मार्मिक विषयों को विद्वता के साथ न केवल उठाती हैं, बल्कि उसे सार्थक उपसंहार तक ले जाती हैं | उनका लेखन दिलचस्प, ज्ञानवर्धक और संदेशपरक होता है |

‘निकालो न बेनक़ाब’ में उन्होंने जैविक-सांस्कृतिक उप्पत्तियों के आधार पर अति अधुनातन और अतिरेकी मिजाज़ की नव नारियों के बेहद खुलेपन, स्वभाव, चाल-चलन, पहनावे आदि को उच्छ्रंखल तथा अभद्र पुरुषों को अनर्गल लैंगिक व्यवहारों के लिए उकसाने वाला सिद्ध करने का प्रयास किया है | उनकी भेदक दृष्टि का एक अवलोकन दृष्टव्य है–- “बेपर्दगी व अनियंत्रित व्यवहार की कोई सीमा नहीं रह गयी है..कपड़े तन को छुपाने के बजाय द्वितीयक लक्षणों को उभारने के लिए प्रयुक्त होने लगे हैं..” xxxxx “पुरुषों की बराबरी करने के लिए पैन्ट्स पहननी आवश्यक है, लेकिन उसे इतना लो किया जाता है कि ज़रा-सा झुकने पर विभाजक रेखा का दर्शन होने लगता है …”

चतुर्थ : निशा मित्तल

चयनित पोस्ट : बच्चे हमारा कल हैं, परन्तु ?

उत्कृष्टता : निशा मित्तल ‘जागरण जंक्शन’ की सक्रिय ब्लॉगरों में से एक हैं | वे सन्देश परक घटनात्मक कहानियाँ तथा विचारोत्तेजक लेखों के साथ बराबर ‘रीडर ब्लॉग’ की फ़ेहरिस्त में दिख जाती हैं | संस्कारहीनता और गिरते जीवन-मूल्यों का चिंतन इनके कथ्य का मेरुदंड होता है, जिसकी बारम्बार परिक्रमा से मौलिक विचार आकार ग्रहण करते हैं |

“बच्चे हमारा कल हैं, परन्तु ?” में निशा मित्तल ने आज के आम घरों में छीझते संस्कारों, बच्चों में पनपती अस्वस्थ चेतना, मांता-पिताओं और बड़ों द्वारा ज़िद्दी लाड़-प्यार का पोषण तथा जाने-अनजाने में चारित्रिक निर्माण की जगह उसके पतन के लिए प्रोत्साहन देने की विसंगति को घटित दृष्टांत के साथ प्रस्तुत किया गया है |

पंचम : यमुना पाठक

चयनित पोस्ट : फूल तोड़ना मना है

उत्कृष्टता : यमुना पाठक ‘जागरण जंक्शन’ की सक्रिय ब्लॉगर हैं |  वे मौलिक और अछूते विषयों को बड़ी गंभीरता से उठाती हैं और निष्कर्ष-विन्दु तक भाषिक कौशल के साथ ले जाती हैं | उनकी ख़ूबी पाठकों के लिए रुचिकर भूमिका के साथ तथ्यात्मक लेख-विस्तार और उसके प्रस्तुतीकरण में भी दिखाई देती है |

‘फूल तोड़ना मना है’ में यमुना पाठक ने नारी के अंत: और बाह्य सौन्दर्य की सत्यता और शिवता का पुरज़ोर समर्थन किया है | उन्होंने नारी को पुष्प से उपमित करते हुए उसके विरुद्ध सदियों से चली आ रही और वर्तमान में और बढ़ रही विषमता को विस्तृत रूप में स्पष्ट किया है | उनके अनुसार जैसे हृदय व संस्कार दोनों से हीन लोग पुष्प को अकारण बेतरतीब से तोड़ते चलते हैं, उसकी पंखुड़ियों को बिखेरते जाते हैं तथा बेरहमी से पैरों से कुचल कर आगे बढ़ जाते हैं; वैसे ही गिरे हुए चरित्रहीन पुरुष नारियों से अमानवीय अश्लील व्यवहार करते हैं और बलात्कार तक की घटना को अंजाम देते हैं |

षष्ठ  : अलका गुप्ता

चयनित पोस्ट : मानव प्रकृति और फाल्स सीलिंग !

उत्कृष्टता : अलका गुप्ता जिस तरह शब्दों को साधती हैं, वह अत्यंत श्लाघनीय है | पहले छपास के रोगी प्रकाशन घरानों की लाभेच्छा के चलते स्तर बनाए रखने के कड़े निर्देश और संपादकों की कड़ी नज़र के कारण सिर्फ़ रोगी बनकर रह जाते थे; किन्तु जब से ब्लॉगिंग की दुनिया ईज़ाद हुई और जागरण जंक्शन-जैसे मंच सामने आए, तब से ब्लॉगर महोदय ख़ुद ही सम्पादकश्री होने लगे और अलका गुप्ता-जैसे ब्लॉगरों को छोड़ कुछ लोग जीवंत शब्दों की जगह शब्दों की लाश पाटने में जुट गए | ऐसे भीड़-भाड़ से अलग अलका गुप्ता पहले विषयपरक तथ्यों को भली-भाँति समझने की प्रक्रिया अपनाती हैं, फिर आबद्ध सोच पर अंत:करण की भावना देती हैं और फिर सप्राणता की आँच से निसृत परिपक्व विचारों के दर्शन कराती हैं |

‘मानव प्रकृति और फाल्स सीलिंग !’ में अलका गुप्ता ने सहज और कृत्रिम व्यवहार वाले व्यक्तियों के अंतर को स्पष्ट किया है | वे असली छत और फाल्स सीलिंग की स्थितियों के आधार पर अंत: सौन्दर्य और बनावटीपन को समझने-समझाने का प्रयास करती हैं | उनका यह लेख आत्म-व्यंजना का पुट लिए हुए है | वे हृदय में कटुता, संकीर्णता और स्वार्थीपन तथा बाहर से अच्छाई ओढ़े कृत्रिम व्यक्तित्त्व की अपेक्षा आतंरिक रूप से व्यवस्थित, दृढ-प्रतिज्ञ और शुद्ध हृदय वाले सरल व्यक्तित्व को महत्त्व देती हैं और कृत्रिम व्यवहार में सुधार-संस्कार की बात करती हैं |

सप्तम : योगी सारस्वत

चयनित पोस्ट :  वहाँ  जिंदगी क़दम क़दम रोती होगी

उत्कृष्टता :  योगी सारस्वत जागरण जंक्शन के सुपरिचित ब्लॉगर हैं | वे देश–विदेश और समाज के रूप-स्वरूप, गति, क्रिया-प्रतिक्रिया आदि पर अंतरवर्ती दृष्टिपात करते हैं और रोज-बरोज की वैश्विक हलचल से प्रासंगिक विषय पर विचार करते हैं | उनकी संवेदना मानव-वेदना की न केवल थाह लेती है, बल्कि उसे मर्मभेदी चेतना के साथ सार्वजनिक भी करती है |

‘वहाँ जिंदगी कदम कदम रोती होगी’ में योगी सारस्वत ने पाकिस्तान और कुछ अन्य देशों में रह रहे वहाँ के हिन्दू नागरिकों की दुर्दशा पर विचारणीय चर्चा की है | वहाँ हिन्दुओं की सहिष्णुता, सौहार्द, भाईचारा और धार्मिक समभाव के बदले अच्छा बर्ताव नहीं होता, उलटे मज़हबी ठेकेदारों और उनकी कट्टरता के चलते आए दिन अपमानित जीवन और मौत का सामना करना पड़ता है |

अष्टम : जे. एल. सिंह

चयनित पोस्ट : मलाला का मलाल

उत्कृष्टता : जे. एल. सिंह हास-परिहास, व्यंग्य, देश-विदेश की समस्या, ज्वलंत घटनाओं आदि पर आधारित विषयों के तात्कालिक और त्वरित ब्लॉगरों में से एक हैं | वे ‘2014 का भारत’ तथा ‘जागरण नगर में होली की हुडदंग !’ में अनेक ब्लॉगरों की खैर-ख़बर लेने में गज़ब की दिलचस्पी दिखाते हैं | गंभीर और व्यापक संवेदनाएँ भी उनकी अभिव्यक्ति से परिपाक लेकर पठनीय आलेख का आकार ग्रहण करती हैं |

‘मलाला का मलाल’ के माध्यम से जे. एल. सिंह ने युग-युग से पुरुषों के दंभ की दासता में जकड़ी नारी-चेतना के कैशोर्य उत्साह, पराक्रम और बलिदान की कीमत पर बढ़े हुए कदमों को अब न रुकने देने और समानता के धरातल पर नारी-सार्थकता का परचम लहरा देने की अनुपम जिजीविषा और संघर्ष को शाब्दिक स्वरूप दिया है |

नवम : फिरदौस खान

चयनित पोस्ट : एक शाम फ्योदोर दोस्तोयेवस्की के नाम

उत्कृष्टता :  फिरदौस खान बड़ी ही साफ़-सुथरी भाषा और झरने की तरह निर्मल विचारों के साथ पाठक के अंतस्तल में गहराई तक उतरती हैं | ‘एनबीटी’ की अपेक्षा ‘जागरण जंक्शन’ के ब्लॉगर ख़ुद ही प्रस्तोता और ख़ुद ही सम्पादक होने के कारण ‘राजा’ हैं | कुछ तो दिग्विजयी राजा हैं – यहाँ तक कि एक पोस्ट कई बार पोस्ट कर देते हैं | कुछ तो न जाने क्या-क्या लिखने के लिए ब्लॉग पर आते हैं –आँय-बाँय-साँय  सब लेकर,  हमारे देश के भीड़तंत्र की मनमानी की तरह | इन सब के विरुद्ध फिरदौस खान की प्रत्येक प्रस्तुति पठनीयता की दृष्टि से बहुत आकृष्ट करती है |

‘एक शाम फ्योदोर दोस्तोयेवस्की के नाम…’ में फिरदौस खान ने मशहूर रूसी लेखक फ्योदोर दोस्तोयेवस्की की किताब के हवाले से उनके संक्षिप्त जीवनवृत्त और साहित्य का रोचक वर्णन किया है और उनके साहित्य से जुड़े कुछ मार्मिक प्रसंग दिए हैं | भाषा और कथ्य की सहजता तथा दर्पण की तरह प्रस्तुति की स्वच्छता लेख की प्रमुख विशेषता है |

दशम : डॉ. शिखा कौशिक

चनित पोस्ट : श्री राम ने सिया को त्याग दिया ?

उत्कृष्टता : शिखा कौशिक प्राचीन-अर्वाचीन दोनों ही अवधारणाओं की कवयित्री हैं | सामाजिक-राजनीतिक उठापटक पर भी वे गंभीर और काव्योक्तियों से पुष्ट चुटीले विचार रखती हैं | उनकी ख़ूबी इस बात में है कि वे युवा मानसिकता के उपरांत पुराने भारतीय मूल्यों की पक्षधर हैं | कथ्य के कसाव और तेवरवाली भाषा की दृष्टि से उनके ब्लॉग पठनीय होते हैं |

‘श्री राम ने सिया को त्याग दिया ?’  में शिखा कौशिक ने सीता-निर्वासन के विवाद पर एक अनूठी उद्भावना का परिचय दिया है | दर असल यह एक ऐसा विवाद है जिस पर संस्कृत और अन्य भारतीय साहित्य में न जाने कितने पृष्ठ सर्फ़ किए गए हैं | पर शिखा कौशिक ने रामकथा की परस्थितियों, प्रसंग, राम-सीता के नैतिक निसर्ग आदि के आधार पर अपनी तर्कना के निकष पर विवादित तथ्य को कसते हुए ऐसी नवीन उद्भावना स्थापित की है, जैसी कदाचित् समाज और साहित्य में पहले नहीं कही-सुनी गई | इस सम्बन्ध में शिखा कौशिक द्वारा उक्त कविता की प्रस्तावना के रूप में प्रस्तुत विचार भी ध्यातव्य है –“सदैव से इस प्रसंग पर मन में ये विचार आते रहे हैं कि क्या आर्य-कुल नारी भगवती माता सीता को भी कोई त्याग सकता है | वो भी नारी सम्मान के रक्षक श्री राम ? मेरे मन में जो विचार आए व तर्क की कसौटी पर खरे उतरे उन्हें इस रचना के माध्यम से मैंने प्रकट करने का छोटा-सा प्रयास किया है |” और कविता के समापक दो बंधों में कवयित्री की अनुपम उद्भावना देखते बनती है—

“होकर करबद्ध सिया ने तब

श्रीराम को मौन प्रणाम किया;

सब सुख-समृद्धि त्याग सिया ने

नारी गरिमा को मान दिया |

मध्यरात्रि  लखन   के  संग

त्याग अयोध्या गयी सिया;

प्रजा में भ्रान्ति ये  फ़ैल गयी

‘श्री राम ने सिया को त्याग दिया’ |”

अंतत: अल्पज्ञता, वैयक्तिक अभिरुचि, स्थानाभाव के कारण जिन ब्लॉगों का उल्लेख यहाँ न हो सका, उनका महत्त्व मेरे इस प्रयास से किसी तरह कम नहीं होता | मैं जागरण जंक्शन के सभी पठित-अपठित ब्लॉगरों के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए आभार मानता हूँ कि उनकी वैचारिक चेतना के चलते ही इस आलेख में कुछ कहना संभव हुआ | अब ब्लॉगिंग लेखन पर भी गहन आलोचना-दृष्टि डालने की आवश्यकता है | इससे मुद्रित वांड्मय की तरह ब्लॉगिंग संसार की भी श्रीवृद्धि होगी |

– संतलाल करुण

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26 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Santlal Karun के द्वारा
January 14, 2014

आदरणीय अनिल कुमार जी, यह पोस्ट पढ़ने तथा आलोचना का लक्षण स्पष्ट करते हुए समर्थित प्रतिक्रिया देने के लिए सहृदय आभार !

anilkumar के द्वारा
January 13, 2014

आदरणीय संतलाल जी , इस आलोचना से सीखा जा सकता है कि आलोचना किसे कहते हैं । आलोचना  मात्र निन्दा नहीं है । आलोचना चारणवृति भी नहीं है । आलोचना इन दोनो के मध्य के आस पास होती  है । आलोचना गुण दोष दोनो का विवेचन होता है । जैसा कि आप ने किया है । बहुत बहुत बधाई ।

January 12, 2014

बहुत सही विश्लेषण किया है आपने जागरण मंच का साथ ही सभी ब्लॉगर्स का जो भी जागरण से जुड़े हैं .मेरे नाम को भी आपने यहाँ स्थान दिया है इसके लिए मैं आपकी आभारी हूँ हालाँकि मैं इस स्थान की अधिकारी नहीं हूँ .

    Santlal Karun के द्वारा
    January 13, 2014

    आदरणीया शालिनी जी, आप बहुत अच्छा लिखती हैं और बराबर सक्रिय रहती हैं | ब्लॉग पर आने तथा समर्थन भरी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
January 12, 2014

ब्लोग शिरोमणी जी ,सादर अभिवादन ,आपकी आलोचना बहुत  गदगदी लगी ,समीक्षा तो भुकम्पी ही होगी ओम शांति शांत शांति 

    Santlal Karun के द्वारा
    January 12, 2014

    आदरणीय हरिश्चंद्र जी, प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार ! ओम शांति शांत शांति !

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
January 12, 2014

आदरणीय -संतलाल करुण जी- आपके आलेख पर टिपण्णी करना भी हम जैसे अल्पज्ञ लेखकों के वश में नहीं हैं .आपने सटीक व् सार्थक आलेख के माध्यम से जागरण के जागरण का प्रयास किया है .मेरी रचना पर आपकी विचाभिव्यक्ति मेरे लिए गौरव का विषय है .साभार

    Santlal Karun के द्वारा
    January 12, 2014

    आदरणीया शिखा जी, आलेख पढ़ने और प्रतिक्रिया देने के लिए हार्दिक आभार !

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
January 11, 2014

नीर-क्षीर विवेक !

    Santlal Karun के द्वारा
    January 11, 2014

    आप की प्रतिक्रिया से संबल मिला; हार्दिक आभार !

yogi sarswat के द्वारा
January 11, 2014

मेरे जैसे एक पार्ट टाइम ब्लोगेर और भावनाएं व्यक्त करते शब्दों को आपने जो सम्मान प्रदान किया है , उसके लिए आपका हार्दिक अभिनन्दन और आभार !

    Santlal Karun के द्वारा
    January 11, 2014

    आदरणीय सारस्वत जी, पोस्ट तक आने के लिए सहृदय आभार ! लेखन किसी छोटे-बड़े पेशे का मोहताज नहीं होता | आप अच्छे से अच्छा लिखने को सोचें और मेहनत करें | हीन भावना बिल्कुल नहीं होनी चाहिए | आप सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर त्वरित गति से अच्छा लिखते हैं, इसलिए लिखते रहिए |

Bhagwan Babu Shajar के द्वारा
January 11, 2014

आप वाकई सुलझे हुए लेखक है… बधाई….

    Santlal Karun के द्वारा
    January 11, 2014

    आदरणीय भगवान बाबू जी, प्रशंसात्मक उद्गार के प्रति हार्दिक आभार !

January 10, 2014

आदरणीय चरण वन्दना, आपने अपने अनुभव के आधार पर सुन्दर अवलोकन किया है । धन्यवाद

    Santlal Karun के द्वारा
    January 11, 2014

    आदरणीय; चित्रकुमार जी, ब्लॉग पढ़ने और संबलकारक प्रतिक्रिया देने के लिए हृदयपूर्वक आभार !

jlsingh के द्वारा
January 10, 2014

श्रद्धेय महोदय, सादर अभिवादन! आपने जिस तरह हरेक के ब्लॉग का अद्ध्ययन कर सभी सम्मानित ब्लॉगरों का मान बढ़ाया है, वह आप ही कर सकते थे. बहुत ही सुन्दर तरीके से आपने लगभग सभी उच्चकोटि के ब्लॉगरों का जिक्र करते हुए, जिन दशनानों का चुनाव किया है और सब पर अपनी पैनी टिप्पणी की है, वह भी आप ही कर सकते थे. आपकी सूची में अपना नाम देखकर मैं फूला न समा रहा हूँ…. वस्तुत: मैं पहले छोटे मोटे लेख लिखकर अपने आसपास के लोगों को सुनाकर या स्थानीय पत्र पत्रिकाओं में छपने का प्रयास करता था. पर जागरण के इस मंच पर जब से मेरा पदार्पण हुआ बहुत सारे पुराने ब्लोग्गर्स ने मेरा हौसला बढ़ाया ..छोटी मोटी गलती का सुधार भी करवाया. उन सभी आदरणीयों का मैं ह्रदय से आभार व्यक्त करता हूँ. उनमे काफी लोग अब उतने सक्रिय नहीं रहे …कारण बहुत सारे हैं, जिनसे आप भी परिचित हैं और आपने उनका भली भांति उल्लेख भी किया है. … आपसे मेरी करबद्ध प्रारथना होगी कि आप इस मंच पर बने रहें और हम सबकी लेखकीय त्रुटि पर ध्यान देकर सुधार का अवसर भी प्रदान करते रहें! ….आपका हार्दिक अभिनन्दन !

    Santlal Karun के द्वारा
    January 11, 2014

    आदरणीय जवाहर जी, आप इस पोस्ट तक आए, हार्दिक आभार ! आप बेहतर लिखते हैं, इसलिए लिखते रहिए | लिखते रहने से ही लेखन में निखार आता है | यह मंच तात्कालिक महत्त्व वाले लेखन के लिए अधिक ठीक है | विशेष रूप से राजनीतिक और सामजिक विषयों पर आधारित लघुकायिक आलेख यहाँ मूल्यवान साबित हों सकते हैं | आप का अधिकतर लेखन उसी श्रेणी का होता है | जहाँ तक मेरी बात है, तो मेरा लेखन जागरण जंक्शन के बहुत उपयुक्त नहीं होता | साहित्यिक सामग्री के लिए और श्रेष्ठ मंच अस्तित्व में आ गए हैं, पर वहाँ के लिए अधिक समय और सन्नद्धता चाहिए | अत: समयाभाव की वजह से आप लोगों के बीच रहता हूँ, वहाँ नहीं जा पाता | यदि कभी गया भी तो भी मैं जागरण जंक्शन नहीं छोडूँगा | यह समाचार तंत्र के बड़े संस्थान का ब्लॉग है | यहाँ की स्वतंत्रता बेजोड़ है और इसकी बहुत बड़ी ख़ूबी | सबसे बड़ी बात लिखते-पढ़ते रहने से एक सुकून मिलता हैं, जो घरेलू और सामाजिक झंझावातों को झलने की शक्ति देता है | आप का पुन: आभार !

    Santlal Karun के द्वारा
    January 9, 2014

    आदरणीय प्रवीण जी, आप ब्लॉग पर आए और लेख पढ़ा, मुझे अच्छा लगा, आप का सहृदय आभार ! आप की प्रतिक्रिया से मैं यह भी जान पाया कि लेख में उठाए गए तथ्यों से आप और कुछ अन्य मित्रगण पहले से ही भली-भाँति अवगत हैं | एक बार पहले भी आप ने भारत मित्र मंच का लिंक दिया था | मैं मंच पर आया भी था | तब शायद मंच आरंभिक चरण में था | मेरी समस्या दूसरी है, समयाभाव— ओबीओ पर एकाउंट बनाए कई महीने हुए, पर एक भी पोस्ट न डाल पाया | कविता कोश और गद्य कोश में रचनाएँ भेजने की मेरी योजना साल-डेढ़ साल से खटाई में पड़ी है | जो समय मिलता भी है, वह जागरण में ही खप जाता है | यदि मैं मंच पर आऊँ और बहुत शिथिल गति में रहूँ, कभी-कभी ही रचनाएँ पोस्ट कर पाऊँ, तो भी तो आप लोगों को अच्छा नहीं लगेगा | जागरण जंक्शन सांस्थानिक है, उसमें जाएँ न जाएँ किसी को क्या पड़ी है, पर भारत मित्र मंच परस्पर मैत्री भाव से आप लोगों ने चलाया है, इसमें मेरा गाहे-बगाहे आना अच्छा नहीं होगा | हाँ, मंच की रचनाएँ मैं जरूर पढ़ता रहूँगा | आप सभी मित्रों को मेरी शुभ कामनाएँ हैं | मंच को समृद्ध कीजिए और आगे बढ़ाइए |

sanjay kumar garg के द्वारा
January 9, 2014

आदरणीय संतलाल जी, सादर नमस्कार! सुन्दर आलोचनात्मक व्याख्या की है आपने, इसके लिए आभार! सर!

    Santlal Karun के द्वारा
    January 9, 2014

    आदरणीय संजय जी, आलेख पढ़ने और प्रतिक्रिया देने के लिए हार्दिक आभार !

shakuntlamishra के द्वारा
January 8, 2014

संतलाल करुण जी सदर नमन ! आपके लेख को मैंने पढ़ा ,मैं बहुत प्रभावित हूँ !मैं तोह समझती थी केवल शौक के लिए लिखते है जागरण पर कभी -कभी मैं भी अपने मन कि उतर लेती थी ! पर आपने लेखको का मान बढ़ाया है प्रोत्साहन दिया है ! संतलाल जी आप बधाई स्वीकार करें ! शकुंतला मिश्रा

    Santlal Karun के द्वारा
    January 8, 2014

    आदरणीया मैडम, आप की इस प्रतिक्रिया से मुझे अपराध-बोध-सा हो रहा है | आप की कविताएँ मुझे बेहद पसंद है, किन्तु लेख लिखते समय आप पता नहीं कैसे छूट गईं ! जागरण जंक्शन के होम पेज और रीडर ब्लॉग के ताज़ा सूची में भी आप उस समय नहीं थीं, इसलिए भी भूल हुई और आप का उल्लेख न कर सका | मैंने अभी एडिट में जाकर आप का नाम जोड़ने की कोशिश तो की, किन्तु यह पोस्ट इतना अधिक स्पेस ले चुकी है कि दो शब्दों के नाम को भी ‘सेव’ करने से मना कर दिया | आप से क्षमा माँग रहा हूँ, पर अजीब-सा लग रहा है | ब्लॉग पर आने और संबल प्रदान करने के लिए आप का हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
January 8, 2014

आदरणीय संतलाल करुणजी,शुभप्रभात.आपका पूरा लेख मैंने दो बार पढ़ा.आपने बहुत अच्छा आलोचनात्मक लेख लिखा है और जागरण मंच के दस सर्वश्रेष्ठ दशानन ब्लॉगरों को चुना है,जो की सौ प्रतिशत सही है.मेरी ओर से इन सभी ब्लॉगर मित्रों को बधाई.ये जागरण के दशानन सदैव अपना सर्वश्रेष्ठ लेख इस मंच को देते रहें,यही मेरी भी कामना है.इस दशानन मण्डली में आप भी शामिल हैं.आपके बिना इस मंच की शोभा ही अधूरी है.अब तो जागरण मंच के लिए दशानन शब्द एक संकीर्ण पात्र बन चूका है,क्योंकि आज के समय में कम से कम पचास सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर इस मंच पर होंगे.किसी भी ब्लॉगर की सभी रचनाएं सर्वश्रेष्ठ नहीं होती हैं और किसी भी ब्लॉगर की सभी रचनाएं कूड़े में फेंकने लायक भी नहीं होती हैं.यही वजह है की दस सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर चुनना या किसी ब्लॉगर की आलोचना करना एक बहुत कठिन काम है.मैं आपके साहस की सराहना करता हूँ.आपको इसके लिए मेरी और से हार्दिक बधाई.अंत में बहुत विनम्रता के साथ अपनी थोड़ी सी चर्चा करूँगा.मैं इस सच्चाई को स्वीकारता हूँ कि मैं लेखन विद्या में अभी पूरी तरह से पारंगत नहीं हूँ.मैं कोई अच्छा कवि या साहित्य्कार नहीं हूँ,बस समाज को कुछ विषय विचारने को दे देता हूँ.मैं अभी आपलोगों से हिंदी में साहित्य लिखना सीख रहा हूँ.जिन महान लेखकों के आत्मकथा का आपने उल्लेख किया है,उनमे से कुछ की मैंने पढ़ी है.मैं अपनी आत्मकथा का बहुत इच्छुक नहीं था,लेकिन पुरानी ख़राब होती डायरी की हालत देखकर लिख दिया.मैंने अपने जीवन की सभी प्रमुख घटनाओं को उसी रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की है.मेरी रचना के बारे में आपने जो कुछ भी कहा है,उसे मैं स्वीकारता हूँ और आपको ह्रदय से धन्यवाद देता हूँ.आपके लेख आलोचनात्मक दृस्टि से भी देखें तो अपने आप में सम्पूर्ण और एक बहुत अच्छा लेख.मेरी और से आपको बधाई.

    Santlal Karun के द्वारा
    January 8, 2014

    आदरणीय सद्गुरु जी, आलोचना की अनुतान में मेरे द्वारा आप की आत्मकथा के सम्बन्ध में जो कुछ भी कहा गया, निवेदन है कि उससे मन छोटा न करें | आप के प्रति मेरे हृदय में बहुत सम्मान है | आप को हतोत्साहित करना मेरा कतई उद्देश्य नहीं था, बल्कि जब आप ने डायरी से आप बीती को बाहर का रास्ता दिखा ही दिया है, तो उसे और विस्तार दें, सभालें, पुनर्लेख करें और पुस्ताकाकार रूप में प्रकाशित कर पाठकों के लिए सार्थक बनाएँ | साहित्य में आलोचना-कर्म निंदा के लिए होता ही नहीं, वह तो साहित्य को और सार्थक बनाने और उसे स्थापित करने के लिए होता है | मैंने इसी उद्देश्य से आप की चर्चा की है और आप ‘सरवाइकल स्पॉन्डिलाइसिस’-जैसी बीमारी को झेलते हुए और ‘सरवाइकल कॉलर’ लगाकर इतना कुछ लिख पाते हैं, जो जूनून तथा अत्यंत रुचि से ही संभव हो सकता है, जिसे मैं अच्छी तरह समझता हूँ | दूसरे आप अच्छा लिखते हैं और निरंतर लिखते जाने से लेखन में निखार आता है | आप ने जितना लेखन अल्प समय में प्रस्तुत किया वह सब के बस की बात नहीं | तीसरे आप का कहना सही है कि कम-से-कम 50 श्रेष्ठ ब्लॉगर मंच पर होंगे | पर ऐसे सभी ब्लॉगरों पर विस्तार से चर्चा संभव न थी | मुझे यह पोस्ट ब्लॉग पर डालने के लिए नाकों चने चबाने पड़े— बड़े फॉण्ट में पोस्ट बार-बार प्रयास करने पर भी जब सेव नहीं हो पाई, तो फॉण्ट छोटा करना पड़ा, फिर भी पोस्ट स्वीकार नहीं हुई, तो लेख को दो पोस्ट में बाँटने का मन हुआ,किन्तु दो चरणों में खंडित तारतम्य मुझे भाया नहीं, फिर आलेख पर कैंची चलानी पड़ी तथा कुछ वाक्यों और अनुच्छेदों को अनिच्छा के बावजूद हटाना पड़ा | ऐसे में जिससे चार-छह बच्चे भी न सँभाले जाते हों, वह मोहल्ले भर के बच्चों को कैसे सँभाल सकता है ? इसलिए अपनी सीमा और अल्पज्ञता के लिए मैं क्षमा-प्रार्थी हूँ | यह भी कि मुझे बहुत अच्छा लगा कि आप ने लेख पर विस्तृत प्रतिक्रिया व्यक्त की और अपने विचार रखे | आप का बहुत-बहुत आभार एवं हार्दिक साधुवाद !


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