अंतर्नाद

मैंने स्वयं रचा, तुम्हारा अनुभूत सत्य, तुम्हारे लिए ...

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दुष्यन्त की प्रेम-याचना

Posted On: 14 Jan, 2014 Others,कविता,Contest,Hindi Sahitya में

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दुष्यन्त की प्रेम-याचना


अहो, मनोरथ-प्रिया !

नहीं तुम ग्रीष्म-ताप से तप्त

काम जो मुझे जलाता है

वही है किए तुम्हें संतप्त |


आश्रम में है शान्ति

किन्तु मेरा मन है आक्रान्त

यहाँ के वृक्ष तुम्हारे भ्रात

लता-बेलों की सगी बहना

तभी हो नव मल्लिका समान

मधुर यह रूप, मदिर ये नयन

दे गया मुझे नेत्र-निर्वाण |


यही समय है, यही घड़ी है

गाढ़ रूप आलिंगन का प्रिय !

कमल-सुवासित सुखद वायु

मालिनी का तट, यह लताकुंज

कितना अभीप्सु यह प्रांत

अभीप्सित है इसका एकांत

सुरक्षित यहाँ गहन मधुपान

जो कितनी तृषा बढ़ाता है

मिलन का राग जगाता है |


हे, करभोरु ! यही समय है

यही घड़ी है, छोड़ो भय

कहो, कमलिनी के पत्ते से

पंखा झलकर ठंडी-ठंडी हवा करूँ

या कहो, तुम्हारे कमल सरिस

इन लाल-लाल चरणों को

अपनी गोद में रख कर

जिस प्रकार सुख मिले दबाऊँ

पृथु नितम्ब तक धीरे-धीरे |


आज चन्द्र शीतल किरणों से

अग्नि-बाण-सा गिरा रहा है

कामदेव फूलों को देखो

वज्र-बाण-सा बना रहा है

खींच रहा है ज्यों कानों तक

फेंक रहा है अनल निरंतर

छोड़ तुम्हारे चरण प्रिये !

अब कहीं नहीं है शरण प्रिये !


हे पुष्पप्रिया ! तुम अनाघ्रात

नख-चिह्न रहित किसलय-जैसी

ना बींधे गए रत्न सम हो

मैं देख रहा हूँ निर्निमेष

तुम ललित पदों की रचना हो

रूप की राशि अनुपमा हो

भौंहें ऊपर उठी हुई हैं

और मेरा अनुराग प्रकट में

छलक रहा हर्षित कपोल पर |


दो शिरीष के पुष्प सुष्ठ

मकरंद सहित डंठल वाले

दोनों कानों में कर्णफूल-से

सजे लटकते गालों तक

अधरोष्ठ रस भरे बिम्बा फल

खस का लेप उरोजों पर

कमलपत्र आवरण वक्ष पर

कमलनाल का कंगन ऊपर

खींचता बार-बार है दृष्टि

वक्ष का यह कर्षक विस्तार

सहे कैसे यह वल्कल भार |


डाली-सी भुजाएँ हैं कोमल

जैसे है हथेली रक्त कमल

नयनों में हरिणी-सी चितवन

अंगों में फूलों का यौवन

गह्वर त्रिवली में तिरता है

यह कैसा दृष्टि-विहार

कुचों के बीच सुकोमल

शरच्चंद्र-सा कमलनाल का हार |


आम्रवृक्ष पर चढ़ती है

माधवी लता संगिनि होकर

गिरती है रत्नाकर में ज्यों

महानदी सर्वस्व लुटाकर

वैसे प्रिय ! अब भुजा खोल

कर लो धारण वपुमान प्रखर

प्रिय मुझे पिलाओ अधरामृत

हो जाऊँ अमर पीकर छककर |


जैसे मृगशावक को हे, प्रिय !

दोने में कमलिनी-पातों के

निज कर से नीर पिलाती हो

वैसे अधरोष्ठ पत्र करके

सुरतोत्सव का ले सुरा-पात्र

मधु-दान करो अंतर्मन से |


मैं बिंधा काम के बाणों से

तुम समझ रही अन्यथा अभी

जब झुकी सुराही अधरों पर

फिर ना-नकार क्या बात रही !


हो गया आज जब प्रकट प्रेम

जब प्रणय-प्रार्थना है समान

हट गया बीच का पट सारा

ना-नुकर का ये कैसा है स्वाँग !


राजभवन का चहल-पहल

है कई वल्लभावों से शोभित

किन्तु प्रिये ! यह पृथ्वी

और प्राणप्रिये ! तुम ही दोनों

कुल की मेरी प्रतिष्ठा हो |


छोड़ो भय, प्रिय ! छोड़ो भय

गुरु जन दोष नहीं मानेंगे

पाया जब अनुराग परस्पर

सम हृदयज्ञ का सम आकर्षण

गन्धर्व विवाह कर लिया

बहुत-सी कन्याओं ने, फिर

सहमति दे दी मात-पिता ने

बंधु-बांधव, गुरुजन ने |


हे, कामसुधा ! इसलिए

नहीं अब छोड़ सकूँगा

छककर क्षाम हुए बिन

नहीं सुधे ! अब नहीं, नहीं

यह देह बहुत आकुल है

जैसे भ्रमर पिया करते हैं

इठलाते सुमनों का रस

मदमाते हैं अधर तुम्हारे

दया बहुत आती है इन पर

पीना है अब कुसुम सरीखे

इन अक्षत अधरों का मद

पी-पीकर मदमत्त भ्रमर-सा

भीतर तक धँस जाना है |



— संतलाल करुण


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35 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
January 24, 2014

छोड़ो भय, प्रिय ! छोड़ो भय गुरु जन दोष नहीं मानेंगे पाया जब अनुराग परस्पर सम हृदयज्ञ का सम आकर्षण गन्धर्व विवाह कर लिया बहुत-सी कन्याओं ने, फिर सहमति दे दी मात-पिता ने बंधु-बांधव, गुरुजन ने | हर एक छंद शानदार श्री करुणजी !

    Santlal Karun के द्वारा
    January 24, 2014

    आदरणीय सारस्वत जी, ब्लॉग पर आने और छंदों की सराहना के हार्दिक आभार !

aman kumar के द्वारा
January 20, 2014

अति सुंदर भाव अभि प्रकटन किया है आपने , शब्दों का चयन मारक है .. आभार

    Santlal Karun के द्वारा
    January 20, 2014

    प्रशंसात्मक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

yamunapathak के द्वारा
January 19, 2014

आदरणीय सर जी इस पौराणिक कथा का कविता के रूप में साहित्यिक रूप बहुत ही सुन्दर है.(शब्द बहुत ही शुद्ध और परिमार्जित हैं…तत्सम शब्दावलियों ने सोने पे सुहागा का काम किया है.

    Santlal Karun के द्वारा
    January 19, 2014

    आदरणीया मैडम, कविता को सहृदय पढ़ने तथा श्लाघात्मक प्रतिक्रिया देने के लिए हार्दिक आभार !

nishamittal के द्वारा
January 18, 2014

स्नातक स्तर पर अभिज्ञान शाकुंतलम पढ़ा था.सुन्दर श्रृंगार वर्णन ने याद ताजा कर दी.

    Santlal Karun के द्वारा
    January 18, 2014

    आप की स्मृतिपरक व आनुभूतिक प्रतिक्रया के लिए सहृदय आभार !

abhishek shukla के द्वारा
January 18, 2014

इंद्र का आयुध पुरुष जो झेल सकता है..सिंह से बाहें मिला कर खेल सकता है…वह भी बिंध जाता सहज बंकिम नयन के बाड़ से..जीत लेती रूपसी नारी इसे मुस्कान से……बचपन में ये कविता पढ़ी थी, इसे नए अंदाज़ पढ़ के आनंद आ गया..आभार

    Santlal Karun के द्वारा
    January 18, 2014

    रचना के प्रति आप की श्लाघात्मक प्रतिक्रिया से मन अभिभूत हो उठा; हार्दिक आभार !

    jlsingh के द्वारा
    January 19, 2014

    आदरणीय अभिषेक शुक्ल जी … सादर अभिवादन! आपकी पंक्तियाँ भी काफी सराहनीय है — इंद्र का आयुध पुरुष जो झेल सकता है..सिंह से बाहें मिला कर खेल सकता है…वह भी बिंध जाता सहज बंकिम नयन के बाड़ से..जीत लेती रूपसी नारी इसे मुस्कान से…… आहा हाहा !!

January 17, 2014

सुंदर रचना आकर्षक चित्र के साथ ।

    Santlal Karun के द्वारा
    January 18, 2014

    रचना और चित्र की प्रशंसा के लिए हार्दिक आभार !

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
January 17, 2014

प्रतिष्ठा की कक्षा में ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम् ‘ पढ़ा करता था , आज तरोताज़ा हो गया | अनाघ्रातम पुष्पं किशलयमलूनं कररूहे ! अनायास स्मरण हो आया !अत्युत्तम ! हार्दिक बधाई सर ! सादर !

    Santlal Karun के द्वारा
    January 18, 2014

    दर असल यहाँ भी कालिदास की ही कल्पना है, मैंने पच्चीस प्रतिशत ही सोचा है | कविता में संवेदानानुभूति तथा बिंबानुबोध के साथ श्लाघात्मक प्रतिक्रया के लिए सहृदय आभार !

    jlsingh के द्वारा
    January 19, 2014

    श्रद्धेय जन, कालिदास की अनुभूति का हम सब के सामने २५ प्रतिशत ही कम नहीं है …महोदय भ्रमर तो पुष्प का रस लेते लेते पुष्प के अंदर ही सो जाता है … सौंदर्य और काम पिपाशा में अद्भुत उत्कंठा होती है जिसे अनुभवी और विद्वतजन ही शब्दों में आबद्ध कर सकते हैं….

    Santlal Karun के द्वारा
    January 20, 2014

    आदरणीय जे.एल.सिंह जी, इस प्रसंग पर काम करने की मेरी इच्छा लगभग दो वर्षों से चली आ रही थी, किन्तु इस वर्ष दिसंबर की छुट्टियों में अवसर मिलते ही प्रासंगिक संवेदना को शाब्दिक आकार मिल सका और इस रुचिकर प्रसंग पर रचना के बाद बड़ा सुकून मिला | आप की टिप्पणी से स्पष्ट है कि यह रचना आप को भी ख़ूब पसंद आई; आप की पठनीयता के लिए हार्दिक आभार !

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
January 17, 2014

उपमा संतलालष्य ,हे ब्लॉग शिरोमणी जी आप तो छुपे रूस्तम निकले ,नाम  संत रचना कामभिभोर ,डुबो दिया आपने तो कण कण को ,सत सत प्रणाम संत जी

    Santlal Karun के द्वारा
    January 18, 2014

    सूर, तुलसी, जायसी आदि सब संत ही रहे हैं, इस लिए सामाजिक लोग अपनी कामुकता संतों के चश्मे से कैसे छिपा सकते हैं ! कविता की संवेदनात्मक अनुभूति के साथ भाव-भरी प्रतिक्रया के लिए सहृदय आभार !

vaidya surenderpal के द्वारा
January 17, 2014

संतलाल करूण जी, बहुत सुन्दर शब्दों में प्रेम की अनुभूतियोँ के ताने बाने मेँ रची काव्य प्रस्तुति के लिये बधाई।

    Santlal Karun के द्वारा
    January 18, 2014

    श्लाघात्मक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

January 17, 2014

सुन्दर भावाभिव्यक्ति .आभार

    Santlal Karun के द्वारा
    January 18, 2014

    प्रशंसात्मक उद्गार के प्रति हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
January 16, 2014

हो गया आज जब प्रकट प्रेम जब प्रणय-प्रार्थना है समान हट गया बीच का पट सारा ना-नुकर का ये कैसा है स्वाँग !आपकी कविता दुष्यन्त की प्रेम-याचना का आँखों देखा हाल प्रस्तुत कर रही है.पूरी तरह से समझने के लिए मुझे दो बार पढ़ना पढ़ा.बहुत अच्छी कविता.मेरी और से भी बधाई.

    Santlal Karun के द्वारा
    January 18, 2014

    प्रतिक्रिया और रचना की सराहना के लिए हृदयपूर्वक आभार !

January 16, 2014

बहुत सुन्दर आदरणीय

    Santlal Karun के द्वारा
    January 18, 2014

    आप के शब्दों ने बहुत संबल दिया; हार्दिक आभार !

ranjanagupta के द्वारा
January 15, 2014

आदरणीय संत लाल जी !सादरनमन !इतनी शिष्ट सौष्ठव पूर्ण कसी ,भाषाई कलेवर में लिपटी ,शिल्प की अद्भुत कारीगरी से मंडित रचना ,,मुझे मन्त्र मुग्ध करने के लिए पर्याप्त है !बहुत दिनों बाद स्तरीयता के चरम को छूती रचना पढने को मिली !अति आभार !!

    Santlal Karun के द्वारा
    January 18, 2014

    आप की प्रशंसा भरी प्रतिक्रया से सृजन का आनंद द्विगुणित हो गया; हार्दिक आभार !

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
January 14, 2014

ati sundar rachna …badhai

    Santlal Karun के द्वारा
    January 18, 2014

    प्रेरक उद्गार के प्रति हार्दिक आभार !

jlsingh के द्वारा
January 14, 2014

कुछ न कहो … कुछ भी न कहो…. क्या कहना है….क्या सुनना है … श्रद्धेय संतलाल जी, इस अनूठी कृति को इस मंच पर साझा करने के लिए बहुत बहुत आभार!

    Santlal Karun के द्वारा
    January 18, 2014

    रचना की प्रशंसा के लिए सहृदय आभार !

alkargupta1 के द्वारा
January 14, 2014

संत लाल जी , आपकी अप्रतिम रचना पढ़कर बहुत ही अच्छा लगा हार्दिक बधाई

    Santlal Karun के द्वारा
    January 18, 2014

    रचना की सराहना के लिए हार्दिक आभार !


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