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ग़ज़ल-ए-शहीदाँ

Posted On: 22 Jan, 2014 Contest,Hindi Sahitya में

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ग़ज़ल-ए-शहीदाँ :


दुश्मने-सरहद को जोशाँ ख़ूँ दिखाने चल पड़े

वादियाँ ख़ूँ तर-बतर हम ख़ूँ नहाने चल पड़े |


सरज़मीं अब तक रही वाबस्तए जानो-जिगर

सरज़मीं के वास्ते अब सीना ताने चल पड़े |


हमज़बाँ देखा ग़ज़ब लगते शरीफ़ों को गले

ज़ह्रागीं मारे-आस्तीं को ख़ुद मिटाने चल पड़े |


ख़ूब सौदाए-शहादत बढ़के याराँ ने किया

आज शैदाए-वतन फिर ख़ूँ बहाने चल पड़े |


घुसपैठिए सियाहदिल सरबरहना सरहदें

सरकोब सरबाज़ हम सरहद बचाने चल पड़े |


ऐ बटालिक काक्सर मश्कोह द्रासो-कारगिल

लो सलामो-अम्न हम वादा निभाने चल पड़े |



— संतलाल करुण


शब्दार्थ :

जोशाँ – उबाल खाता हुआ,  सरज़मीं – मुल्क,  वाबस्तए-जानो-जिगर – जान और जिगर से जुड़ा हुआ,  हमज़बाँ – सहमत,  शरीफ़ों – सज्जनों,  ज़ह्रागीं – विषैला,  मारे-आस्तीं – आस्तीन का साँप,  सौदाए-शहादत – बलिदान का सौदा,  याराँ – मित्रगण,  शैदाए-वतन – देश-भक्त,  सियाहदिल – बेरहम,  सरबरहना – नंगे  सिर,  सरकोब – सर कुचलने वाला, सरबाज़ – बहादुर |



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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sanjay kumar garg के द्वारा
January 27, 2014

“घुसपैठिए सियाहदिल औ’ सरबरहना सरहदें सरकोब हम, सरबाज़ हम, सरहद बचाने चल पड़े |” “स” शब्द की सुन्दर अभिव्यक्ति, सुन्दर गजल के लिए सादर धन्यवाद, आदरणीय सर!

    Santlal Karun के द्वारा
    January 27, 2014

    आदरणीय संजय कुमार जी, ग़ज़ल को गौर से पढ़ने और तारीफ़ के लिए तहे दिल से शक्रिया !

sadguruji के द्वारा
January 27, 2014

ऐ बटालिक, काक्सर, मश्कोह, द्रासो-कारगिल तुमको सलामो-अम्न, हम कुर्बां जगाने चल पड़े.अच्छी ग़ज़ल.आपको बधाई.

    Santlal Karun के द्वारा
    January 27, 2014

    आदरणीय सद्गुरु जी, ग़ज़ल की तारीफ़ के लिए तहे दिल से शुक्रिया !

ranjanagupta के द्वारा
January 27, 2014

बहुत देश भक्ति के जज्बे से ओतप्रोत गजल !यदि शब्दार्थ न होते तो समझने में मुश्किल होती !बहुत बधाई आदरणीय संत लालजी !!

    Santlal Karun के द्वारा
    January 27, 2014

    आदरणीया रंजना जी, ग़ज़ल की तारीफ़ के लिए हार्दिक आभार !

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
January 25, 2014

जय हिन्द ! जोश से भरपूर ……सामयिक रचना …गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें !

    Santlal Karun के द्वारा
    January 27, 2014

    आदरणीया शिखा जी, प्रशंसा भरी प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार !

udayraj के द्वारा
January 22, 2014

शहिदों की शहादत और अपने जवानों के लिए आपकी इस सुंदर विचारों की पढ़ कर अनायास  दिनकर जी की कुछ पंत्तियां याद आ रही हैं । जो चढ़ गए पूण्‍य वेदी पर लिए विना गरदन  का मोल कलम आज उनकी जय बोल 

    Santlal Karun के द्वारा
    January 27, 2014

    आदरणीय उदयराज जी, ग़ज़ल पढ़ने और दिनकर की याद के लिए सहृदय आभार !

yamunapathak के द्वारा
January 22, 2014

आदरणीय सर जी आपकी यह ग़ज़ल बहुत ही उम्दा है इस प्रतियोगिता की सबसे अच्छी बात यह कि हमें अपने साहित्य ,भाषा को परिष्कृत करने का भरपूर अवसर मिल रहा है इस ग़ज़ल के द्वारा कितने उर्दू शब्द हम सीख पा रहे हैं मैं इन्हे डायरी में नोट कर लेती हूँ . आपका अति आभार

    Santlal Karun के द्वारा
    January 27, 2014

    आदरणीया यमुना जी, यह जानकार खुशी हुई कि ग़ज़ल आप को पसंद है | प्रशंसात्मक शब्दों के लिए हार्दिक आभार !

jlsingh के द्वारा
January 22, 2014

आदरणीय संतलाल जी, सादर अभिवादन! शहीदों के सम्मान में जितना कुछ भी लिखा जाय कम है, उन सभी शहीदों को सलाम और आपकी लेखनी को नमन!

    Santlal Karun के द्वारा
    January 27, 2014

    आदरणीय जे.एल.सिंह जी, शहीदों के प्रति सम्मान तथा आदरार्थक सद्भाव लिए सहृदय आभार !


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