अंतर्नाद

मैंने स्वयं रचा, तुम्हारा अनुभूत सत्य, तुम्हारे लिए ...

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बहुत हुआ

Posted On: 4 May, 2014 Others,social issues,कविता में

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बहुत हुआ


मुद्दों की बात मत करो

बहुत हुआ |

अब मत उछालो हवा में

मुद्दों के संखिया भरे हरे-हरे गोलगप्पे

हम इन्हें आँख उठा-उठाकर देखते रहे

मुँह बाते रहे, दौड़ते रहे, खाते रहे, मरते रहे

पर अब बहुत हुआ |

तुम्हारी सियासत की दुकान पर बेइंतहा

मजमे का लगे रहना

तुम्हारे वोटों की मुरादाबादी तिजोरी का भरते रहना

तुम्हारे मुद्दों के शो-रूम का रह-रहकर दमकते रहना

बहुत हुआ, बहुत हुआ, बहुत हुआ |


एक अरसा हुआ मुद्दों का चलन

घावों पर मरहम-पट्टी का दिखावा

बहुत हुआ |

तुम पीटते हो ढिंढोरा देश की अखण्डता का

और घोंपते हो देश के अंग-अंग में ज़हर-बुझे भाले

तुम करते हो मुनादी स्थायी सरकार की

और लंगड़ी मार-मारकर गिराते हो सरकारें

तुम डुगडुगी बजाते हो राममंदिर की

और ठहाका मारते हो सोने की लंका में

तुम दुहाई देते हो धर्म-निरपेक्षता की

और तोड़ते-तुड़वाते हो अम्बेडकर की मूर्ति

गांधी की समाधि

निर्वस्त्र कर गाँव भर में घुमाते हो बुधुआ की औरत

ऊपर से पंडिताऊ हवाला देते हो वेद-पुराण का

तुलसी-चाणक्य का

बरकरार रखना चाहते हो बाबरी मिजाज़ कदम-कदम पर

धरम की आड़ में अहं का कृपाण चमकाना चाहते हो

लोकसभा के बीचोबीच

तुम चिल्लाते हो डंके की चोट पर देश बचाओ

ग़रीबी हटाओ /राष्ट्रभाषा /समाजवाद

साक्षरता /रोज़गार /आरक्षण

मगर करते हो मूँछाबोर देश-भक्षण

अब मत गर्माओ मुद्दों का बाज़ार

ओ मुद्देबाजो ! ओ आदमखोरो  !

बहुत हुआ, बहुत हुआ, बहुत हुआ |


लोकतन्त्र के झण्डाबरदार बिजूको,

अब बहुत हुआ |

तुम कब तक भेड़-खाल में छिपकर पैदा होते रहोगे

क्या तुम्हारी ठग-विद्या हमेशा कामयाब रहेगी

अब हम मुहर मारकर निठल्ले बैठनेवाले नहीं

अब सरे बाज़ार तुम्हारी दोग़ली खाल उतारी जाएगी

अब तुम्हारी दिग्विजय का काला घोड़ा गाहे-बेगाहे

हर चौराहे पर रोका जाएगा

अब केवल तुम्हारी पगड़ी का

अब केवल तुम्हारी टोपी का

अब केवल तुम्हारी दाढ़ी का

अब केवल तुम्हारे क्लीन फ़ेस का

जादू चलनेवाला नहीं

बहुत हुआ, बहुत हुआ, बहुत हुआ |


— संतलाल करुण



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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
May 14, 2014

आदरणीय संतलाल करुण जी ! हार्दिक अभिनन्दन ! आप मेरी आलोचना को अन्यथा मत लीजियेगा ! जिस रचनाकार की कृतियों से मुझे बहुत लगाव होता है मैं आलोचना भी सिर्फ उसी की करना पसंद करता हूँ ! मैंने आपको उकसाया केवल ये जानने के लिए कि-” अपने कार्य क्षेत्र से दूर जाकर न केवल स्वयं, बल्कि मेरे परिवार के सभी सदस्यों ने अभी ७ मई को मत दान किया है !” मुझे ये जानकर बहुत ख़ुशी हुई ! अधिकतर बुद्धिजीवी वोट डालने नहीं जाते हैं और घर बैठकर केवल कविता,कहानी और लेख के माध्यम से देश की भ्रस्ट व्यवस्था को कोसते हैं ! क्या इससे हमारे देश में कोई व्यवस्था परिवर्तन होगा,कभी नहीं होगा ! मैंने चुनाव के दौरान अनगिनत लोंगो को वोट डालने के लिए प्रेरित किया और १२ मई को मैंने और मेरे परिवार ने मतदान केंद्र जाकर वोट दिया ! मेरी नजर में आप इस मंच के उत्कृष्ट रचनाकार और वरिष्ठ बुद्धिजीवी है ! मैंने अपने कमेंट में जो कुछ भी कहा है,वो आप के माध्यम से देश के सभी बुद्धिजीवियों को कहा है ! आदरणीय सिंह साहब भी शायद यही कहना चाहते थे ! आपको अच्छी रचना के लिए बधाई ! आप लिखते रहिये ! अपने सादर प्रेम और शुभकामनाओं सहित !

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
May 13, 2014

आदरणीय संत लाल करूँ जी ,मैं राजनीती हूँ मेरी स्तुती ,आरती बहुत सुन्दर लगी ,मेरा आशीर्वाद है की आप राजनीती के सर्व गुण संपन्न कवि बनो ऱाजनेताओ मै आपका ऩवरत्नों सा मान हो राजनीती खुश हुई  ओम शांति शांति

    Santlal Karun के द्वारा
    May 14, 2014

    आदरणीय हरिश्चंद्र जी, आप के मनमौजी प्रतिक्रियात्मक भावों के प्रति आदर एवं हार्दिक आभार !

deepak pande के द्वारा
May 13, 2014

आदरणीय संतलाल जी bahut खूब कुछ जनता को अपने आप भी सुधारना होगा आखिर इस भ्रष्ट व्यवस्था के भागीदार जनता भी केवल नेता ही नहीं

sadguruji के द्वारा
May 13, 2014

आदरणीया संतलाल करुण जी ! सादर अभिनन्दन ! आपने कविता अच्छी लिखी है,परन्तु क्या घर बैठे कविता लिखने से कोई जनक्रांति हो जाएगी ? आप जैसे बुद्धिजीवी अपने जैसे किसी दूसरे बुद्धिजीवी को प्रभावित करते हैं,वहहि की अौपचारिकता होती है और बात खत्म ! फिर आप जैसे विद्वान लोग अगली रचना लिखने में व्यस्त हो जाते हैं.परन्तु इससे आम आदमी कहाँ प्रभावित हो रहा है.वो तो शयद आपकी कविता का असली अर्थ भी नहीं समझ पायेगा.अधिकतर बुद्धिजीवी अपनी रचनाओं से अच्छा सन्देश देते हैं,परन्तु व्यवहारिक रूप में जब अमल की बात आती है तो मतदान केंद्र तक वोट डालने भी नहीं जाते हैं.क्या सभी पार्टियों और नेताओं को अपनी रचनाओं में कोसने और गाली भर देने से उनके कर्तव्य की इतिश्री हो जाती है ?उनसे अच्छे तो अनपढ़ और कम पढ़ेलिखे लोग हैं जो वोट देकर भ्रस्ट नेताओं और सरकार को उनके पद से हटाने का प्रयास करते हैं.बुद्धिजीवी लोग वस्तुत: बहुत स्वार्थी होते हैं,जो किसी सामाजिक क्रांति के लिए नहीं बल्कि अपने स्वार्थ,मन की संतुष्टि और यश के लिए लिखते हैं.आज यही स्थिति देश के बुद्धिजीवियों की है.देश की दुर्दशा के लिए वो ज्यादा जिम्मेदार हैं.

    jlsingh के द्वारा
    May 14, 2014

    आदरणीय सद्गुरुजी, सादर अभिवादन! सत्य बहुत करुण होता है. आपकी बातों से बहुत हद तक सहमत हूँ. बुद्धिजीवी लोग वस्तुत: बहुत स्वार्थी होते हैं,जो किसी सामाजिक क्रांति के लिए नहीं बल्कि अपने स्वार्थ,मन की संतुष्टि और यश के लिए लिखते हैं.आज यही स्थिति देश के बुद्धिजीवियों की है.देश की दुर्दशा के लिए वो ज्यादा जिम्मेदार हैं. और ज्यादा कुछ कहने की हिम्मत मुझमे नहीं …अब देश की जनता ने अपना मत दे दिया है जनता के फैसले को मानना ही हमारी नियति रही है ..इंतज़ार कुछ चमत्कारों का….सादर!

    Santlal Karun के द्वारा
    May 14, 2014

    आदरणीय सद्गुरु जी, टिप्पणी करते समय आप के मन में आक्रोश का कौन-सा इतना बड़ा घड़ा था, जो बेलाग इतने आरोपों के साथ मुझ पर फूट पड़ा, मेरे लिए अनुमान लगाना कठिन हो रहा है | हाँ, बौद्धिक जीविका के कारण मैं आप के आरोप का दोषी हूँ, पर ज्ञान के विशालतम क्षेत्र में बुद्धिजीवियों की श्रेणी में मैं अपने आप को कहीं नहीं पाता | स्वार्थी भी हूँ, इस आरोप पर विचार करने पर पाता हूँ कि मेरे कुछ परोक्ष-अपरोक्ष कृत्य जो नि:स्वार्थ भाव से चालित होते होंगे, वे ईश्वर की असीम कृपा के चलते होते होंगे | शेष शरीर और निजता के लिए खाना-पीना, पहनना-ओढ़ना, घर-मकान, नौकरी-चाकरी, आय-व्यय, बाल-बच्चे आदि का अधिकांश मेरे स्वार्थ को ही पोषित करता है | जहाँ तक कविता की बात है, तो यह दोषारोपण मेरे लिए नागपाश से कम नहीं है, इससे तो बच पाने का प्रश्न ही नहीं, ऊपर से मेरी कविता का असली अर्थ भी आम आदमी नहीं समझ पाएगा (?) अब बढ़ती उम्र के इस पड़ाव पर स्वयं और अपनी कविता को कहाँ और कैसे बदलूँ ? डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी कृत ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ एक बेजोड़ तथा प्रशंसित उपन्यास है, पर उसकी समझ उच्च शिक्षित व्यक्ति के लिए भी कम श्रमसाध्य नहीं है, तब भी उस कृति की महत्ता बरकरार है | अन्यार्थ न लीजिएगा, मैं उनसे अपनी तुलना नहीं कर रहा हूँ, प्रबुद्ध पूर्वजों से प्रेरणा और सीख की चेतना विद्यार्थी जीवन से अवश्य रही है | नर्तक के समक्ष आखिर आँगन करे भी तो क्या करे, समझ में नहीं आता ? मेरे सामने आपने ऐसा ही विचारणीय प्रश्न दे दिया है | वैसे कविता जीवनगत परिस्थितियों के कारण मुझे से बहुत दूर हो चुकी है, बस बची-खुची राख-सी थोड़ी-बहुत ढो रहा हूँ और क्या करूँ जब-तब उसकी सुगबुगाहट से अपने-आप को बचा नहीं पाता, इसलिए कविता के कारण भी आप का कम दोषी नहीं हूँ | आप मुझे मेरी कविता से क्यों अलग करना चाहते हैं, मेरी समझ से परे है (!) धन-दौलत, घर-परिवार, रिश्ते-नाते सब के सब कहीं-न-कहीं चोट पहुँचाते हैं | एक कविता ही तो मेरी नितांत अपनी है, जो हर हाल में मुझे सुकून देती है | आप की भाषा में संतुष्टि के दोष से मुझे ग्रस्त करती है | यदि पढ़ा-लिखा हुआ होना बुरा होना है, तो इस आरोप के दण्ड से मुझे इस जन्म में मुक्ति मिलने से रही | आप ने याद दिलाया है तो सोचता हूँ कि दूसरे को हानि पहुँचाए बिना, बिना हलचल का सरल-निश्छल जीवन जीने की राह पर चलने का भरसक प्रयास करता आया हूँ तथा यह शतप्रतिशत सच है कि अब तक कोई क्रांति खड़ी न कर सका ? इसके लिए आज-कल की प्रतिभा-हीनता और वर्तमान जीवन-कौशल की कमी के अतिरिक्त मुझे दूसरा कारण समझ में नहीं आता | इस प्रकार स्वार्थ, मन की संतुष्टि का मैं महा दोषी हूँ, कोई विशेष यश-अपयश नहीं मिला यह संयोग की बात है | सद्गुरु जी, अंतत: आप के सारे आरोप शिरोधार्य हैं ( केवल एक विन्दु कि अपने कार्य क्षेत्र से दूर जाकर न केवल स्वयं, बल्कि मेरे परिवार के सभी सदस्यों ने अभी 7 मई को मत दान किया है )| फिर भी दुर्वासा-कोप के आगे मैं नम्रशिरष्क भाव से कृतज्ञ हूँ कि आप ब्लॉग पर आए और साहित्यिक गाली ही सही, मगर दिया तो कुछ-न-कुछ ! आप की प्रशंसा मिलती रही है, तो आलोचना भी मेरे लिए प्रसाद ही है | आप का बहुत-बहुत आभार !

    Santlal Karun के द्वारा
    May 14, 2014

    आदरणीय जे.एल. सिंह जी, सच कड़वा होता है, पर लगता है मेरे कारण अब करुण भी होने लगा है | खैर.., मैं आप दोनों की बातों से सहमति-असहमति से अलग देख रहा हूँ कि आप दोनों ने मेरी कविता से अलग बहस छेड़ दी है | पर मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ कि मैं इतना बड़ा बुद्धिजीवी कब से हो गया (!) रही क्रांति-वांति की बात तो अपनी ऐसी कोई औकात नहीं, सामान्य-सा वोटर हूँ | क्या करूँ, आप दोनों की निराशा से ( मैं क्रांतिकारी बुद्धिजीवी जो नहीं हो पा रहा हूँ !) मैं भी निराश हूँ | आप दोनों फैसला माने न माने, आगे की नियति क्या होनी है, मुझे नहीं पता (?), पर मैंने और मेरे जैसे करोड़ों लोगों ने अपना मत दे दिया है | ब्लॉग पर आने और प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

    jlsingh के द्वारा
    May 14, 2014

    श्रद्धेय श्री संतलाल जी, सादर अभिवादन! आपको दुःख पहुँचाने का कोई इरादा न रखते हुए आपको हिलाने डुलाने/झकझोड़ने की इच्छा जरूर थी. राजनीति हम सब के जीवन का अहम हिस्सा है ..इससे हम अपने आपको अलग नहीं रख सकते … आपने अपना मत दिया है साथ ही अपना मत (विचार) यहाँ प्रकट किया है. पर यह आम भाषा में न होकर बुद्धिजीवी की ही भाषा हो गयी … मोदी जी ने जनता का नब्ज पहचाना और आम आदमी के भाषा का प्रयोग किया …आम आदमी की भाषा में बिश्वास पैदा करने वाले ये पहले नेता नहीं हैं … कांग्रेस से पीड़ित जनता आखिर क्या करती ? उसने अपनी बेहतरी के लिए मोदी जी को चुना है (एग्जिट पोल के अनुसार)… अब जरूरत है, मोदी जी को अपने वादे पर खड़े उतड़ने की… ‘आम आदमी पार्टी’ का भविष्य क्या होगा? यह मतदान में मिले उनके मत प्रतिशत पर निर्भर करेगा. मेरा मानना है कि जब तक अच्छे और इमानदार लोग चतुराई से राजनीति में नहीं आयेंगे, कीचड़ में या तो हाथ गंदे होंगे या कमल खिलेंगे … बस मेरा तात्पर्य यही है … सद्गुरुजी का आक्रोश उनके उस समय की मनोदशा पर आधारित है. कृपया अन्यथा न लें और हम सभी अपने विचारों की अभिव्यक्ति नि:संकोच करते रहें … हम सभी एक दूसरे को समझाने, समझने की कोशिश करते रहें … अगर हम कलम के माध्यम से कुछ लोगों को भी अपने विचार से प्रभावित कर पाते हैं, वही बहुत है. हम सभी अपने रोजगार से बंधे हैं और यह स्थिति नही है कि सक्रिय राजनीति में कूद पड़ें …. मैंने भी अपना विचार रक्खा है, आशा है इसे सकारात्मक लेंगे …आप हम सबों में वरिष्ठ, ज्ञानी, बुद्धिजीवी, साहित्यिक हस्ती तो हैं हीं. सम्पूर्ण श्रद्धा के साथ. जवाहर .

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
May 12, 2014

आदरणीय संतलाल करुण जी , सादर अभिवादन !अति उत्कृष्ट समसामयिक प्रस्तुति ! हादिक आभार !

    Santlal Karun के द्वारा
    May 14, 2014

    आदरणीय गुंजन जी, आप के प्रशंसात्मक उद्गार के प्रति हार्दिक आभार !

May 4, 2014

very nice expression .ek din ye to hon ahi hai .

    Santlal Karun के द्वारा
    May 14, 2014

    आदरणीया शालिनी जी, रचना की सराहना के लिए हार्दिक आभार !


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