अंतर्नाद

मैंने स्वयं रचा, तुम्हारा अनुभूत सत्य, तुम्हारे लिए ...

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पर्वत पर उतरा इन्द्रधनुष

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पर्वत पर उतरा इन्द्रधनुष


पर्वत पर उतरा इन्द्रधनुष

मैं कैसे रंग बटोरूँ |


धरा नील, नीला अम्बर

गिरि-घाटी नीले-नीले

नयन हो रहे नील-नील

मन नीलकमल-सा झूले

नील निलय की कौंध नील

मैं कैसे नीलम लोढूँ |


हरी दूर्वा दरी चतुर्दिक

दूर-दूर तक फैली

पग सकुचाते, नयन बिछलते

ऐसी रची रँगोली

ऋतु-अभिसारिन सेज-सजी

मैं कैसे प्रीति न जोडूँ |


रूप विविध, आकार विविध

नव रंग नवल आभाएँ

भिन्न-भिन्न आकृतियों में

किरणों की ललित कलाएँ

नव रत्नों के रंगमहल में

कैसे तन-मन घोलूँ |


प्रकृतिमयी श्रृंगार-स्वरूपा

सपनीली-सी दृग-वनिता

खिसकाए कुहरा-पट जागे

मदिर सकामा सुंदरता

ऐसी रचना की श्री को

कैसा सिन्दूर बहोरूँ |


— संतलाल करुण



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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Veer Suryavanshi के द्वारा
June 18, 2014

” पर्वत पर उतरा इन्द्रधनुष ” बहुत ही सुन्दर कविता है चाँद शब्दों में आपने प्रकृति के अनेक रंगों को संजोया , बहुत अच्छा लगा खासकर – रूप विविध, आकार विविध नव रंग नवल आभाएँ भिन्न-भिन्न आकृतियों में किरणों की ललित कलाएँ नव रत्नों के रंगमहल में कैसे तन-मन घोलूँ आपको बधाई देते हुए अनुरोध करता हूँ कृपया इसपे भी नज़र डाले – http://veersuryavanshi.jagranjunction.com/2014/06/12/%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%be/?preview=true&preview_id=753722&preview_nonce=fb17c66b80

    Santlal Karun के द्वारा
    June 23, 2014

    आदरणीय सूर्यवंशी जी, भावपूर्ण प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार !

deepak pande के द्वारा
June 17, 2014

पृकृति का खूबसूरत सौंदर्य का बहुत ही सुन्दर वर्णन आदरणीय करूँ jee

    Santlal Karun के द्वारा
    June 17, 2014

    आदरणीय दीपक जी, भावपूर्ण प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार एवं सद्भावनाएँ !

sadguruji के द्वारा
June 17, 2014

आदरणीय संतलाल करुण जी ! प्रकृति प्रेम पर आधारित बहुत सुन्दर ओ सार्थक रचना ! आपको बधाई देते हुए इस रचना के लिए आपके शब्दों में ही बस इतना कहूँगा-”ऐसी रचना की श्री को कैसा सिन्दूर बहोरूँ !”

    Santlal Karun के द्वारा
    June 17, 2014

    आदरणीय सद्गुरु जी, आप ने रचना देखी और प्रकृति-प्रेम के भावों को पसंद किया, सहृदय आभार एवं सद्भावनाएँ !

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 16, 2014

रूप विविध, आकार विविध नव रंग नवल आभाएँ भिन्न-भिन्न आकृतियों में किरणों की ललित कलाएँ नव रत्नों के रंगमहल में कैसे तन-मन घोलूँ |  स्तरीय कविता ,भाषा का अनुपम सौन्दर्य कविता का श्रंगार कर रहा है ,बहुत ही सुंदर रचना सादर बधाई आदरणीय संतलाल जी ,और भी कविताओं की प्रतीक्षा है .

    Santlal Karun के द्वारा
    June 16, 2014

    आदरणीया निर्मला जी, आप ने रचना देखी, इसका स्तर और भाषा-सौन्दर्य आप को पसंद आया तथा आप ने हृदय से रचना की सराहना की | … सहृदय आभार !

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
June 13, 2014

वाह ! पढ़कर मन तृप्त और तन पवित्र हो गया | इंद्रधनुष के सात रंग में डूब-डूबकर सुधि खोते हैं ! कुछ ऐसे भी क्षण होते हैं !! सादर बधाई !!

    Santlal Karun के द्वारा
    June 16, 2014

    आदरणीय गुंजन जी, आप के मन की तृप्ति और तन की पवित्रता से मेरी रचनाधर्मिता भी सुतृप्त तथा पावन हो गई; सहृदय आभार !

sanjay kumar garg के द्वारा
June 12, 2014

“ऋतु-अभिसारिन सेज-सजी मैं कैसे प्रीति न जोडूँ |” अति सुन्दर अभिव्यक्ति आदरणीय संतलाल जी! साभार!

    Santlal Karun के द्वारा
    June 16, 2014

    आदरणीय संजय जी अभिव्यक्ति में सौंदर्य ढूँढने के लिए सहृदय आभार !

June 11, 2014

बहुत सुन्दर भावना को शब्दों में संजोया है आपने .

    Santlal Karun के द्वारा
    June 16, 2014

    आदरणीया शालिनी जी, ब्लॉग पर आने और प्रशंसात्मक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद !


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