अंतर्नाद

मैंने स्वयं रचा, तुम्हारा अनुभूत सत्य, तुम्हारे लिए ...

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हृदय सहचर

Posted On: 17 Jun, 2014 कविता में

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हृदय सहचर


तुम्हारा रूप था ऐसा

आह, कितना रहा सुन्दर !


तुम्हारा हृदय था निर्मल

मेरे मन का सहज सहचर |


तुम्हारे हाथ रखते थे

मेरे कर्मों से न अंतर |


तुम्हारे पाँव बढ़ते थे

मेरे संघर्ष के पथ पर |


तुम्हारा अंत ही दाहक

जलूँ दिन-रात रह-रहकर |


हवन-सी अनबुझी यादें

सँजोए आह भर-भरकर |


– संतलाल करुण

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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
July 29, 2014

bahut सुन्दर पंक्तियाँ हैं सर जी

    Santlal Karun के द्वारा
    July 29, 2014

    आदरणीया यमुना जी, प्रशंसा के लिए सहृदय आभार !

    Santlal Karun के द्वारा
    June 25, 2014

    आदरणीय योगी जी,  भावपूर्ण प्रतिक्रया के लिए सहृदय आभार !

ranjanagupta के द्वारा
June 24, 2014

आदरणीय संतलाल जी ,बेहद मार्मिक और ह्रदय स्पर्शी रचना! ‘ओ खण्डित प्रणय बन्धु मेरे किस भांति कहाँ तुझको खोजूँ ? कब तक पहनूँ यह मौन धैर्य ,बोलूँ भी तो किससे बोलूँ ? निराला की यह पंक्तियाँ बरबस याद हो आईँ !..सादर..!!

    Santlal Karun के द्वारा
    June 24, 2014

    आदरणीया रंजना जी, निराला की पंक्तियों के उद्धरण के साथ रचनागत भावों की थाह लेने तथा समवेदनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए सहृदय आभार !

श्वेता के द्वारा
June 23, 2014

बहुत ही सुन्दर रचना दर्द में डूबी हुई …….

    Santlal Karun के द्वारा
    June 24, 2014

    आदरणीया श्वेता जी, भावपूर्ण प्रतिक्रिया के लिए हृदयपूर्वक आभार !

sadguruji के द्वारा
June 21, 2014

आपका व्यक्तिगत दुःख लगी ये रचना ! अपने ह्रदय की पीड़ा आपने अभिव्यक्त की है !

    Santlal Karun के द्वारा
    June 23, 2014

    आदरणीय सद्गुरु जी, रचना में व्यक्त पीड़ा पर आनुभूतिक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

June 20, 2014

हवन-सी अनबुझी यादें सँजोए आह भर-भरकर | गहन अभिव्यक्ति .बधाई .

    Santlal Karun के द्वारा
    June 23, 2014

    आदरणीया शालिनी जी, रचना की सराहना के लिए हार्दिक आभार !

jlsingh के द्वारा
June 20, 2014

तुम्हारा हृदय था निर्मल मेरे मन का सहज सहचर | तुम्हारे हाथ रखते थे मेरे कर्मों से न अंतर | आदरणीय श्री संतलाल जी, सादर अभिवादन ! काफी दिनों बाद तपती धरती पर जैसे वर्ष की बूँदें!

    Santlal Karun के द्वारा
    June 23, 2014

    आदरणीय जे.एल. सिंह जी, आप की अनुभूत प्रतिक्रया के लिए सहृदय आभार !

sanjay kumar garg के द्वारा
June 18, 2014

“तुम्हारा अंत ही दाहक जलूँ दिन-रात रह-रहकर, हवन-सी अनबुझी यादें सँजोए आह भर-भरकर!” अति सुंदर अभिव्यक्ति, “जिसमें प्रेयसी का केवल जाना ही दुखद हो!” “विरह रस” की उँचाइयों को छूती!! सुंदर रचना के लिए आभार व बधाई! आदरणीय संत लाल जी!

    Santlal Karun के द्वारा
    June 23, 2014

    आदरणीय संजय जी, प्रशंसात्मक उद्गार के प्रति हार्दिक आभार !

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 17, 2014

तुम्हारे हाथ रखते थे मेरे कर्मों से न अंतर | तुम्हारे पाँव बढ़ते थे मेरे संघर्ष के पथ पर | अहसास और ज़ज्वातों की ह्रदय स्पर्शी अभिव्यक्ति ,बहुत सुंदर रचना ,आदरणीय संतलाल जी .

    Santlal Karun के द्वारा
    June 23, 2014

    आदरणीया निर्मला जी, आप ने रचना में व्यक्त पीड़ा पर तदात्मक प्रतिक्रिया दी; हार्दिक आभार !


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