अंतर्नाद

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सूख गए मधुवन

Posted On: 23 Jun, 2014 कविता में

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सूख गए मधुवन


सूख गए मधुवन जीवन के

आशाओं की संध्या उलझी, शून्य क्षितिज के सूनेपन से |


नभ के चल घनश्याम घनेरे

चन्दा-मुख चूमते निगोड़े

झंझा के आते सब सपने, बिखर गए अपलक नयनन के |


विद्युत-बान गँसीले खिंचते

खिंचते ही मन-मृग जा बिंधते

कहाँ छिपे हृद-रेख गहन दे, वे संधान चपल चितवन के |


अंचल पावस-ऋतु बरसाते

गिरि-घाटी रस-पीन सुहाते

ओझल हो गए चटकीले-से, उगते ही सुरधनु उपवन के |


धरती धुलती जावक-जैसी

झड़ी रिमझिमी नूपुर-ध्वनि-सी

उचट गए बरखा के मेले, सच होते सपने सावन के |


— संतलाल करुण

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22 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
June 30, 2014

करूण आपकी कविता बहुत साॅफ्ट है पढ़ने मैं बहुत अच्छी लगती आप इसी तरह खूबसूरत कविताये रचते रहे और हम सब पढ़ते रहें डॉ शोभा भरद्वाज

    Santlal Karun के द्वारा
    July 3, 2014

    धन्यवाद मैडम !

utkarshsingh के द्वारा
June 29, 2014

उत्कृष्ट काव्य कृति, साधुवाद !

    Santlal Karun के द्वारा
    June 29, 2014

    आदरणीय उत्कर्ष जी, प्रशंसात्मक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
June 29, 2014

आदरणीय , सादर ! पावस की नूपुर-ध्वनि से शब्द-शब्द अनुगुंजित से प्रतीत हो रहे हैं | आप की शब्द-साधना को शत-शत प्रणाम ! पुनश्च !

    Santlal Karun के द्वारा
    June 29, 2014

    आदरणीय आचार्य गुंजन जी, रचना के प्रति श्लाघात्मक उदगार के लिए सहृदय आभार !

anilkumar के द्वारा
June 27, 2014

आदरणीय संतलाल जी , सत्य है कि न तो प्रकृति का मधुबन शाश्वत और न ही जीवन का मधुबन शाश्वत है । जीवन के मधुबन की स्मृतियां , भावी जीवन का संबल हैं , धरोहर हैं । प्रकृति के मधुबन की स्मृतियां इस जैसी सुन्दर और सशक्त कविता को जन्म देतीं हैं । बहुत बहुत बधाई ।

    Santlal Karun के द्वारा
    June 27, 2014

    आदरणीय अनिल जी, कविता पर दार्शनिक प्रतिक्रिया तथा प्रशंसात्मक उद्गार के प्रति हार्दिक आभार !

jlsingh के द्वारा
June 27, 2014

विद्युत-बान गँसीले खिंचते खिंचते ही मन-मृग जा बिंधते कहाँ छिपे हृद-रेख गहन दे, वे संधान चपल चितवन के | श्रद्धेय महोदय, सादर अभिनंदन! भला कौन ऐसा होगा जो चपल चितवन के बाण से न बिंधा होगा…

    Santlal Karun के द्वारा
    June 27, 2014

    आदरणीय जे.एल. सिंह जी, रचना पर व्याख्यात्मक टिप्पणी के लिए सहृदय आभार !

sanjay kumar garg के द्वारा
June 25, 2014

“सूख गए मधुवन जीवन के आशाओं की संध्या उलझी, शून्य क्षितिज के सूनेपन से |” अति सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए आभार आदरणीय संतलाल जी!

    Santlal Karun के द्वारा
    June 26, 2014

    आदरणीय संजय जी, प्रशंसात्मक उद्गार के प्रति हार्दिक आभार !

    Santlal Karun के द्वारा
    June 26, 2014

    आदरणीय योगी जी, प्रेरक उद्गार के प्रति हार्दिक आभार !

June 24, 2014

अवलोकन कर सुन्दर भावों का ,मँडराएंगें भँवरे आकर वैसे ही जैसे हम आये सुन्दर सलोनी कविता पाकर फिर लहलाएगा मधुबन उम्मीदों से जुड़ा रहे मन .सार्थक अभिव्यक्ति बधाई .

    Santlal Karun के द्वारा
    June 26, 2014

    आदरणीया शालिनी जी, आप की ढाढ़स बँधाती प्रतिक्रियात्मक छंदोक्ति के लिए सहृदय आभार !

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 24, 2014

सुंदर भावनाएं और उत्कृष्ट शब्द शिल्प का अनोखा मेल है इस कविता में ,ह्रदय स्पर्शी रचना ,सादर बधाई .

    Santlal Karun के द्वारा
    June 26, 2014

    आदरणीया निर्मला जी, श्लाघात्मक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
June 24, 2014

आदरणीय संतलाल जी ! सादर अभिनन्दन ! ह्रदय को स्पर्श करती हुई बहुत भावपूर्ण अभिव्यक्ति ! बहुत बहुत बधाई !

    Santlal Karun के द्वारा
    June 26, 2014

    आदरणीय सद्गुरु जी, रचनागत सराहना के लिए सहृदय आभार !

ranjanagupta के द्वारा
June 24, 2014

आदरणीय संतलाल जी ! मन को मथ कर ही भाव ह्रदय तक आप पाते है ,उत्कृष्टरचना अंतरतम को हिला देती है !और चरम अभिव्यक्ति को छू लेती है ,कुछ वैसा ही अनुभूत हुआ इस रचना को पढ कर !!सादर !!

    Santlal Karun के द्वारा
    June 26, 2014

    आदरणीया रंजना जी, रचना में व्यक्त संवेदनाओं का अनुभूतिपरक काव्यालोचन एवं प्रतिक्रिया के रूप में भावपूर्ण विचारों के लिए सहृदय आभार !


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