अंतर्नाद

मैंने स्वयं रचा, तुम्हारा अनुभूत सत्य, तुम्हारे लिए ...

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एक चिरैया सोना-माटी

Posted On: 10 Jul, 2014 Others,कविता में

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एक चिरैया सोना-माटी


जिस बाग तू गाती गीता रे,

उस बाग में दिन मेरा बीता रे !

ओरे, सोना-माटी चिरैया

गाती तू सुख-दुःख गीता रे !


जब चिरैया सुबह तू गाती

जब रे दुपहर में तू गाती

तब मैं गंगा-धार बहाता

गोमुख से सागर तक जाता

गाते-गाते साँझ ढले

चुप हो जाती मनमीता रे !


होती पतझर देख रुआँसी

मधुबन में चहकार मचाती

घनी ये आम-बबूली छाया

मैं भी तो धरती का जाया

गरमी, बरखा, जाड़ा सारा

जाता तुझ सँग बीता रे !


मौसम-बेमौसम सब होते

हाथों के फल मीठे-तीते

बीते की पाथर-पाटी के

कदम निशान कहाँ मिटते

आलस का मुर्दाघर सोता

सजग सदा जगजीता रे !


धूप-छाँह का रंग जमाता

फूल-बाग लहराता-गाता

काँटों को जो झेल न पाता

बाग से बाहर हो ही जाता

डाल-पात भी बहुत गिरे

पर बाग कभी न रीता रे !


— संतलाल करुण

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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
July 18, 2014

आदरणीय सर जी सम्पूर्ण कविता जीवन दर्शन से परिपूर्ण और अंतिम पंक्तियों(बहुत सुन्दर ) तक तो यह बहुत प्रभावकारी तरीके से व्यक्त हुआ है आभार

    Santlal Karun के द्वारा
    July 18, 2014

    आदरणीया यमुना जी, प्रशंसात्मक उद्गार के प्रति हार्दिक आभार !

Sushma Gupta के द्वारा
July 17, 2014

मन को सुख देने बाली प्रकृति का सुन्दर चित्रण हुआ है आपकी रचना में … हार्दिक वधाई करुण जी..

    Santlal Karun के द्वारा
    July 17, 2014

    आदरणीया सुषमा जी, रचना की प्रशंसा के लिए हार्दिक आभार !

jlsingh के द्वारा
July 16, 2014

धूप-छाँह का रंग जमाता फूल-बाग लहराता-गाता काँटों को जो झेल न पाता बाग से बाहर हो ही जाता डाल-पात भी बहुत गिरे पर बाग कभी न रीता रे ! आदरणीय संतलाल सर बहुत सुन्दर संदेशपरक रचना! सादर बधाई!

    Santlal Karun के द्वारा
    July 17, 2014

    आदरणीय जे.एल.सिंह जी, रचना की सराहना के लिए सहृदय आभार !

sanjay kumar garg के द्वारा
July 11, 2014

“काँटों को जो झेल न पाता बाग से बाहर हो ही जाता डाल-पात भी बहुत गिरे पर बाग कभी न रीता रे” ! “जीवन दर्शन” की अति सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए सादर बधाई! आदरणीय संतलाल जी!

    Santlal Karun के द्वारा
    July 13, 2014

    आदरणीय संजय कुमार जी, प्रतिक्रिया और गीत की सराहना के लिए हृदयपूर्वक आभार !

ranjanagupta के द्वारा
July 11, 2014

जीवन दर्शन का अद्भुत सामंजस्य छोटी सी कविता के माध्यम से !सादर !साभार !!

    Santlal Karun के द्वारा
    July 13, 2014

    आदरणीया रंजना जी, रचना की सराहना-भरी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

anilkumar के द्वारा
July 10, 2014

एक चिरैया सोना माटी , जीवन का दर्शन समझाती । सच सच बतला एक चिरैया , कवि गाता या तू है गाती ।। बहुत सुन्दर संतलाल जी , मौसम-बेमौसम सब होते हाथों के फल मीठे-तीते बीते की पाथर-पाटी के कदम निशान कहाँ मिटते आलस का मुर्दाघर सोता सजग सदा जगजीता रे ! सम्भवतः यह ही कर्मयोग है । बहुत बहुत बधाई ।

    Santlal Karun के द्वारा
    July 13, 2014

    आदरणीय अनिल कुमार जी, गीत में व्यक्त दर्शनपरक भावों की समझ के साथ भाव-भरी प्रतिक्रया के लिए सहृदय आभार !

shakuntlamishra के द्वारा
July 10, 2014

डाल पात भी बहुत गिरे ,पर बाग़ कभी न रीता रे !सच है संतलाल करूँ जी बहुत अच्छा !

    Santlal Karun के द्वारा
    July 13, 2014

    आदरणीया शकुन्तला जी, प्रेरक उद्गार के प्रति हार्दिक आभार !


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