अंतर्नाद

मैंने स्वयं रचा, तुम्हारा अनुभूत सत्य, तुम्हारे लिए ...

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गाँस खंजरशुदा हो गई

Posted On: 22 Jul, 2014 Others,कविता में

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गाँस ख़ंजरशुदा हो गई


डूब सूरज गया दोपहर का

चाँदनी भी विदा हो गई |


रात अँधेरी न घर तेल-बाती

तनहा कटतीं न काटे ये रातें

लद गईं दर्द की मारी पलकें

नींद जैसे हवा हो गई |


टूटे दर्पन की तीखी दरारें

जिन पे उँगली फिराती हैं सुधियाँ

घाव फिर-फिर हरे हो रहे

गाँस ख़ंजरशुदा हो गई |


मील-पत्थर-सा ऐसा क्या जीना

खंडहर-मौत क्या मर न पाए

रोज ज़िंदा दफ़न करती अपना

ज़िन्दगी खुद सज़ा हो गई |


नाव कागज़ की ओ, खेनेवाले !

सिर्फ़ वादे ही भारी लगे क्यों ?

आँसू दिल के धुआँ हो गए

साँस जलती चिता हो गई |


— संतलाल करुण

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20 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
July 29, 2014

आदरणीय सर जी अंतिम पंक्तियाँ बहुत सुन्दर हैं . साभार

    Santlal Karun के द्वारा
    July 29, 2014

    आदरणीया यमुना जी, अंतिम पंक्तिया आप को पसंद आईं, जानकार अच्छा लगा, प्रतिक्रिया के लिए सहृदय आभार !

sanjay kumar garg के द्वारा
July 28, 2014

“डूब सूरज गया दोपहर का चाँदनी भी विदा हो गई | रात अँधेरी न घर तेल-बतनहा कटतीं न काटे ये रातें लद गईं दर्द की मारी पलकें नींद जैसे हवा हो गई |” मन की गहराईयों में उतरती “विरह रस” की परिपूर्ण अभिव्यक्ति! “नीरज जी” ने भी लिखा है-”चाँद को बाह में उलझाये लचकती बाहें, कोइ शरीफ, कोइ शोख लहर आती है, उड़ते पानी की तरह याद तेरी उड़-उड़कर, कभी दामन को, कभी दिल को भिगो जाती है!” सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए पुन बधाई! आदरणीय संतलाल जी!

    Santlal Karun के द्वारा
    July 28, 2014

    आदरणीय संजय जी, नीरज-जैसे काव्य-पुरोधा की पंक्तियाँ उद्धृत करते हुए भावपूर्ण प्रतिक्रया तथा प्रशंसात्मक उद्गार के लिए हार्दिक आभार !

nishamittal के द्वारा
July 27, 2014

अत्यंत भावपूर्ण रचना आदरणीय संतलाल जी

    Santlal Karun के द्वारा
    July 28, 2014

    रचना की प्रशंसा के लिए सहृदय आभार !

    Santlal Karun के द्वारा
    July 25, 2014

    आदरणीय सारस्वत जी, प्रेरणात्मक प्रतिक्रिया के लिए हृदयपूर्वक आभार !

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
July 23, 2014

करुण ही निकाल सकता है करुणामयी लेखनी आँसू दिल के धुआँ हो गए साँस जलती चिता हो गई बस ओम शांति शांति शांति जपना ही बाकी है सादर अभिवादन संत लाल जी 

    Santlal Karun के द्वारा
    July 25, 2014

    आदरणीय हरिश्चंद्र जी, सराहना और भावपूर्ण प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार !

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
July 23, 2014

टूटे दर्पन की तीखी दरारें जिन पे उँगली फिराती हैं सुधियाँ घाव फिर-फिर हरे हो रहे गाँस ख़ंजरशुदा हो गई |  भावना ,ह्रदय और आँखे ,भीग गए ये पंक्तियाँ पढ़ कर ,दर्द को शब्दों में बुन दिया है ,इस दर्द से हम सब ही गुजरे हैं कभी न कभी पर आप ने जुवां देदी ,बहुत आभार आदरणीय संतलाल जी .

    Santlal Karun के द्वारा
    July 25, 2014

    आदरणीया निर्मला जी, आप की प्रशंसा और अनुभूत प्रतिक्रया के लिए सहृदय आभार !

pkdubey के द्वारा
July 23, 2014

सच है सर , कष्ट के क्षणों में ऐसा ही लगता होगा हर जीव को |

    Santlal Karun के द्वारा
    July 25, 2014

    आदरणीय पी.के. दुबे जी, आप ने रचना में व्यक्त पीड़ा पर आनुभूतिक प्रतिक्रिया दी; हार्दिक आभार !

jlsingh के द्वारा
July 23, 2014

आदरणीय श्री संतलाल जी, सादर अभिवादन! आपने सारी करुणा और आवेग को उछाल दिया है ..एक एक शब्द जलती सांस ही है और साँस जलती चिता हो गई |… सादर!

    Santlal Karun के द्वारा
    July 25, 2014

    आदरणीय जे.एल.सिंह जी, संवेदना और अनुभूति भरी प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
July 22, 2014

नाव कागज़ की ओ, खेनेवाले ! सिर्फ़ वादे ही भारी लगे क्यों ? आँसू दिल के धुआँ हो गए साँस जलती चिता हो गई | बहुत ह्रदय स्पर्शी रचना ! आपके स्वयं की अनुभूत की हुई गहरी वेदना महसूस हुई ! मंच पर प्रकाशित करने के लिए आभार !

    Santlal Karun के द्वारा
    July 25, 2014

    आदरणीय सद्गुरु जी, कविता की संवेदनात्मक अनुभूति के साथ भाव-भरी प्रतिक्रया के लिए सहृदय आभार !

ranjanagupta के द्वारा
July 22, 2014

आदरणीय संतलाल जी !बहुत करुण है आपके शब्द !घातक वेदना के ये तीर वास्तव में जीवन की घोर विषमता को दर्शाते है!पर जिंदगी का जहर पीकर ही शिव होता हैं ,कोई भी मनुष्य !और तब उसकी उदार करुणा विश्व् में अपना आँचल पसार कर सबको उसके नीचे छुपा लेती है !सादर !साभार !!

    Santlal Karun के द्वारा
    July 25, 2014

    आदरणीया रंजना गुप्ता जी, गीत की संवेदानानुभूति के साथ श्लाघात्मक प्रतिक्रया के लिए सहृदय आभार !


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