अंतर्नाद

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साथ जीने की सज़ा

Posted On: 21 Aug, 2014 Others,कविता में

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साथ जीने की सज़ा


चाहतों ने गुलजमीं पे चाँदनी जब छा दिया

आहटों ने बढ़ तराना प्यार का तब गा दिया |


हाथ कैदी की तरह सहमे हुए थे कैद में

कैदख़ाने में किसी ने दिल थमा बहका दिया |


पाँव में थीं बेड़ियाँ, बेदम नज़र, मंजिल न थी

हौसले ने वक्त पे सिर से कफ़न फहरा दिया |


होंठ काँटों के हवाले खूँ से लथपथ थे पड़े

फूल की ख़ुशबू ने टाँके खींचकर महका दिया |


मातमी अंदाज़ में लोगों का जमघट था लगा

साथ जीने की सज़ा ने मौत को झुठला दिया |


— संतलाल करुण

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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
August 31, 2014

आदरणीय सर जी बहुत ही सुन्दर रचना हर पंक्ति मुखर है साभार

    Santlal Karun के द्वारा
    September 2, 2014

    आदरणीया यमुना जी, रचना पसंद आई, सहृदय आभार !

yogi sarswat के द्वारा
August 28, 2014

पाँव में थीं बेड़ियाँ, बेदम नज़र, मंजिल न थी हौसले ने वक्त पे सिर से कफ़न फहरा दिया | होंठ काँटों के हवाले खूँ से लथपथ थे पड़े फूल की ख़ुशबू ने टाँके खींचकर महका दिया | एकदम बढ़िया श्री करुण जी

    Santlal Karun के द्वारा
    August 29, 2014

    आदरणीय सारस्वत जी, ग़ज़ल की प्रशंसा के लिए सहृदय आभार !

ranjanagupta के द्वारा
August 22, 2014

आदरर्णीय संतलाल जी !बहुत खूबसूरत गजल !अंतिम पक्तियों में शब्दों का भाव बोध बहुत ही चित्ताकर्षक है !!सादर !!साभार !!

    Santlal Karun के द्वारा
    August 25, 2014

    आदरणीया रंजना जी, ग़ज़ल की तारीफ़ और प्रेरक प्रतिक्रिया से संबल मिला; हार्दिक आभार !

pkdubey के द्वारा
August 22, 2014

बहुत लम्बे अरसे के बाद आप को पढ़ा आदरणीय.आप जैसे मूर्धन्य साहित्य साधक हम लोगों के लिए एक प्रकाश पुंज हैं,जिसके प्रकाश में बैठकर हम भी कुछ लिखना सीख रहे.मंच पर कृपा बनाये रखिये .

    Santlal Karun के द्वारा
    August 25, 2014

    आदरणीय दुबे जी, आप के बड़प्पन और सराहना भरी प्रतिक्रिया से सृजन का आनंद दुगुना हो गया; सहृदय आभार !

jlsingh के द्वारा
August 22, 2014

मातमी अंदाज़ में लोगों का जमघट था लगा साथ जीने की सज़ा ने मौत को झुठला दिया | आदरणीय संतलाल जी, सादर अभिवादन!…गजब की marmik पंक्तियाँ पूरी ग़ज़ल वाह वाह कहने योग्य! सादर !

    Santlal Karun के द्वारा
    August 25, 2014

    आदरणीय जे.एल.सिंह जी, ग़ज़ल की तारीफ़ के लिए तहे दिल से शुक्रिया !

deepak pande के द्वारा
August 21, 2014

मातमी अंदाज़ में लोगों का जमघट था लगा साथ जीने की सज़ा ने मौत को झुठला दिया वाह इन panktiyon ने दिल को छू लिया आदरणीय करूँ jee

    Santlal Karun के द्वारा
    August 25, 2014

    आदरणीय दीपक जी, प्रशंसात्मक उद्गार के प्रति हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
August 21, 2014

आदरणीय संतलाल करुण जी ! हार्दिक अभिनन्दन ! बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना ! बहुत बहुत बधाई !ह्रदय को स्पर्श करतीं अनुपम पंक्तियाँ-मातमी अंदाज़ में लोगों का जमघट था लगा साथ जीने की सज़ा ने मौत को झुठला दिया |

    Santlal Karun के द्वारा
    August 25, 2014

    आदरणीय सद्गुरु जी, रचना की सराहना के लिए हार्दिक आभार !


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