अंतर्नाद

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हाते का पेड़

Posted On: 5 Sep, 2014 Others,कविता में

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हाते का पेड़


घर के हाते मेँ

हिल-हिल के रोया है पेड़ ।

आज धरती पे

गिरा, ठूँठ सोया है पेड़ ।


पेड़ के कोटर मेँ

एक चिड़िया रहा करती थी

मैँ तो इस पेड़ की

चिड़िया हूँ, कहा करती थी ।

चार चिड़ियाएँ छोटी

पेड़ पे फिर आने लगीँ

सभी हिल-मिल के

मीठे-मीठे गीत गाने लगीँ ।

एक दिन, सब कुछ छोड़

कोटर से उड़ गई चिड़िया

छोटी चिड़ियाओँ को

कोटर मेँ रख गई चिड़िया,

डाल हर उस दिन

आँसू से भिगोया है पेड़ ।


दिन गए,  माह गए

साल दो-चार गए,

याद मेँ चिड़िया के

हर पत्ते हँसी भूल गए ।

एक दिन आई

उसी पेड़ पे नई चिड़िया

चारोँ चिड़ियाओँ के

मन भाई वह नई चिड़िया,

डाल पे बैठ-बैठ

मीठे गीत गाने लगी

चुन के तिनका-तिनका

कोटर वह सजाने लगी,

फिर तो लौटे हुए

मौसम मेँ समोया है पेड़ ।


फिर उसी कोटर मेँ

चिड़ियाएँ सभी रहने लगीँ

कभी चहकार, कभी

चोँ-चोँ रार करने लगीँ,

हर एक रार मेँ

कोटर का चैन छिन जाता

हर एक रार मेँ

जड़ोँ से पेड़ हिल जाता

हर एक रार मेँ

पत्ता कोई बिखर जाता

हर एक रार मेँ

घावोँ से पेड़ भर जाता,

आँधी-पानी से नहीँ

रो-रो के सोया है पेड़ ।


पेड़ हाते का

रिश्तोँ से हरा होता है

अपनी जड़ पे नहीँ

चाहत पे खड़ा होता है

वह तने से नहीँ

मानोँ से बड़ा होता है

पेड़ हाते का

यादोँ से लदा होता है ।

आज डालोँ की नहीँ,

फूल-पत्तोँ की नहीँ,

मर्म भारी जो पड़े

साथ उनका भी नहीँ,

आज, बेखौफ़ पड़ा

ख़ुद मेँ खोया है पेड़ ।


— संतलाल करुण

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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
September 10, 2014

पेड़ हाते का रिश्तोँ से हरा होता है अपनी जड़ पे नहीँ चाहत पे खड़ा होता है ! मन को छूती हुईं लाजबाब पंक्तियाँ ! बहुत सार्थक,शिक्षाप्रद और उपयोगी रचना ! आदरणीय संतलाल करुण जी ! ऐसे उत्कृष्ट और उयोगी काव्य सृजन के लिए सादर अभिनन्दन और बधाई !

    Santlal Karun के द्वारा
    September 10, 2014

    आदरणीय सद्गुरु जी, रचना को लेकर आप की श्लाघात्मक प्रतिक्रिया से मेरी रचनात्मक प्रवृत्ति को प्रेरणा मिली; आप का हार्दिक आभार !

Shobha के द्वारा
September 9, 2014

आदरणीय संत लाल जी हमारे घर के दरवाजे पर गुलमोहर का पेड़ था बहुत मुश्किल दे बचाया पटरी बनी पेड़ के घेरे को छोड़कर पक्की पटरी वना दी गई पेड़ का कौन ध्यान करता है कुछ समय बाद पेड़ जड़ समेत उखड़ गया जिन लोगो की पेड़ की लकड़ी पर नजर थी उनके लिए तो सुखद बात थी परन्तु हम जानते है हमने कैसे झेला पेड़ पर कुल्हाड़ी चल रहीं थी हमे ऐसे लग रहा था जैसे हम पर चल रही हो आज भी खाली जगह देख कर हूक उठती है आप की कविता ने हमारा गुलमोहर याद दिला दिया डॉ शोभा

    Santlal Karun के द्वारा
    September 9, 2014

    आदरणीया शोभा जी, आप की मार्मिक प्रतिक्रिया से मेरी तदात्मक संवेदना गह्वर हो गई, हार्दिक साधुवाद !

yamunapathak के द्वारा
September 7, 2014

आदरणीय सरजी जाने क्यों प्रतिक्रिया पोस्ट नहीं हो रही आपके इस ब्लॉग ने मुझे इमली का पेड़ याद दिला दिया जिसे दादी ने भूत होने के दर से कटवा दिया था . साभार

    Santlal Karun के द्वारा
    September 8, 2014

    प्रतिक्रियात्मक भावों के प्रति हार्दिक आभार !

September 6, 2014

sahi kaha aapne santlal ji hate ka ped rishton se hara hota hai .sundar abhivyakti .badhai .

    Santlal Karun के द्वारा
    September 7, 2014

    आदरणीया शालिनी जी, रचना की सराहना के लिए हार्दिक आभार !

Ravinder kumar के द्वारा
September 6, 2014

संत लाल जी, सादर नमस्कार. घर के बड़े पेड़ ही होते हैं. जिनके कोटर रूपी गोद में पूरा परिवार समाया होता है. बेहतरीन कविता के लिए आपको शुभकामनाएं. पेड़ हाते का रिश्तोँ से हरा होता है अपनी जड़ पे नहीँ चाहत पे खड़ा होता है

    Santlal Karun के द्वारा
    September 7, 2014

    आदरणीय रवीन्दर कुमार जी, आप ने रचना में व्यक्त पीड़ा पर आनुभूतिक प्रतिक्रिया दी; हार्दिक आभार !

bhagwandassmendiratta के द्वारा
September 6, 2014

पिता की हथेली में आसमान जितनी सुरक्षा का एहसास करवाती आपकी इस कविता का कद भी आसमान जितना ही ऊँचा है| मन की व्यथा मन में ही रख हर गम को पी जाने की शक्ति भी आँगन के पेड़ में ही हो सकती है |सुन्दर भावों को दर्शाती हुई सुंदर कविता के लिए बहुत बहुत साधुवाद|

    Santlal Karun के द्वारा
    September 7, 2014

    आदरणीय भगवानदास जी, रचना के प्रति आप की श्लाघात्मक प्रतिक्रिया से मन अभिभूत हो उठा; हार्दिक आभार !

jlsingh के द्वारा
September 6, 2014

बड़ी मार्मिक और बेहतरीन सलीके सजाई गयी रचना जो सोचने पर मजबूर करती है . पेड़ बूढा हो या घर का हो कोई बड़ा, रिश्ते बनते हैं अगर हो प्यार का पानी पड़ा. सादर साधुवाद! बीच बीच में अपनी उपस्थिति से हम सबको सिंचित करते रहें आदरणीय श्री संतलाल जी!

    Santlal Karun के द्वारा
    September 7, 2014

    आदरणीय जे.एल.सिंह जी, आप की प्रशंसा भरी प्रतिक्रया से सृजन का आनंद द्विगुणित हो गया; हार्दिक आभार !

sanjay kumar garg के द्वारा
September 5, 2014

एक पेड़, एक बुजुर्ग, या घर के मुखिया की अंतरदशा का बड़ी गहराई के साथ विवरण प्रस्तुत करती आपकी कविता “हाते का पेड़” दिल की गहराई मे उतर गई! इस कविता ने काफ़ी कुछ सोचने के लिए विवश कर दिया! साभार धन्यवाद! आदरणीय संत लाल जी!

    Santlal Karun के द्वारा
    September 7, 2014

    आदरणीय संजय जी, ‘हाते के पेड़’ के मर्म की अनुभूतिपरक प्रतिक्रिया के लिए हृदयपूर्वक आभार !

pkdubey के द्वारा
September 5, 2014

पेड़ और चिड़िया के रूपक से घर ,परिवार ,समाज, देश की आज की परिस्थति को दर्शाता काव्य आदरणीय |सादर साधुवाद |

    Santlal Karun के द्वारा
    September 7, 2014

    आदरणीय पी.के.दुबे जी, सामाजिक यथार्थ और कविता की आनुभूतिक प्रतिक्रया के लिए सहृदय आभार !


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