अंतर्नाद

मैंने स्वयं रचा, तुम्हारा अनुभूत सत्य, तुम्हारे लिए ...

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मंच-दाँ रहनुमा

Posted On: 25 Sep, 2014 social issues,कविता में

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मंच-दाँ रहनुमा


तुम हुए मंच-दाँ जब से मन निहाई हो गया

यों मगर खाली निहाई पीटने से क्या हुआ |

सोन-माटी के कबाड़े क्यों नजर आते नहीं

सिर्फ़ बातों की हथौड़ी से धरा सब रह गया |


तुम हुए रहनुमा मकसद घर से बाहर चल पड़े

पर तुम्हारी रहबरी ने क्या-क्या जिल्लत ना दिया |

लूटने का हुनर दौलत की हवस बढ़ती गई

आबरू पे भी निगाहें जीना मुश्किल कर दिया |


तुम सियासत के सदन से निकलकर बागी हुए

दर्द का मारा लगा हम सब के ख़ातिर आ गया |

तेंदुए की चाल लेकिन तुम छिपा पाए नहीं

देखकर बस्ती का हर घर खौफ़ से सहम गया |


खूँ-पसीने की कमाई उजले कालिख में फँसी

हर फसल अच्छी रही पर हाथ कुछ भी ना मिला |

मंच से बोली लगाया बनके तुमने खेतिहर

चौधरी फिर खुद ही बन खलिहान सारा ले लिया |


– संतलाल करुण



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13 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
February 7, 2015

श्री करुण बेहद खूबसूरत भावों वाली रुबाइयाँ डॉ शोभा

    Santlal Karun के द्वारा
    February 7, 2015

    आदरणीया डॉ. शोभा जी, सराहना भरी प्रतिक्रिया और प्रेरणापरक उदगार के लिए सहृदय आभार !

Bhola nath Pal के द्वारा
October 7, 2014

आदरणीय करुण जी ! कुछ अच्छा पढने को मिला I चित्त प्रशन्न हो गया I लगा पढने का श्रम सार्थक हुआ Iप्रतीक्षा करूंगा I

sadguruji के द्वारा
October 1, 2014

आदरणीया संतलाल करुण जी ! विचारणीय पंक्तियाँ-मंच से बोली लगाया बनके तुमने खेतिहर,चौधरी फिर खुद ही बन खलिहान सारा ले लिया ! सार्थक रचना ! बधाई !

    Santlal Karun के द्वारा
    October 1, 2014

    आदरणीय सद्गुरु जी, रचना पर प्रतिक्रियात्मक प्रसंशा के प्रति हार्दिक आभार !

abhishek shukla के द्वारा
September 30, 2014

तुम सियासत के सदन से निकलकर बागी हुए दर्द का मारा लगा हम सब के ख़ातिर आ गया | तेंदुए की चाल लेकिन तुम छिपा पाए नहीं देखकर बस्ती का हर घर खौफ़ से सहम गया |….सर्वश्रेष्ठ पंक्तियाँ…बधाई!!

    Santlal Karun के द्वारा
    October 1, 2014

    आदरणीय अभिषेक जी, सराहना भरी प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
September 30, 2014

तुम सियासत के सदन से निकलकर बागी हुए दर्द का मारा लगा हम सब के ख़ातिर आ गया | तेंदुए की चाल लेकिन तुम छिपा पाए नहीं देखकर बस्ती का हर घर खौफ़ से सहम गया | vastvikta se ot-prot sundar v sarthak abhivyakti .badhai

    Santlal Karun के द्वारा
    October 1, 2014

    आदरणीया शिखा जी, रचना पढ़ने और प्रतिक्रिया देने के लिए हार्दिक आभार !

yamunapathak के द्वारा
September 30, 2014

आदरणीय सर जी बेहद सटीक पंक्तियाँ हैं साभार

    Santlal Karun के द्वारा
    October 1, 2014

    आदरणीया यमुना जी, पंक्तियों की प्रशंसा के लिए सहृदय आभार !

Yagyima Nehabala के द्वारा
September 28, 2014

खूँ-पसीने की कमाई उजले कालिख में फँसी हर फसल अच्छी रही पर हाथ कुछ भी ना मिला | बेहद सधी हुई रचना…कम शब्दों में बहुत कुछ कह दिया आपने ।

    Santlal Karun के द्वारा
    October 1, 2014

    आदरणीया यज्ञिमा जी, रचना की सराहना के लिए हार्दिक आभार !


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