अंतर्नाद

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ये कैसी धुन है !

Posted On: 2 Oct, 2014 कविता में

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ये कैसी धुन है !


सबकुछ जाने सबकुछ समझे

पागल ये फिर भी धुन है

औचक टूट गए सपनों की

उचटी आँखों की धुन है |


इस धुन की ना जीभ सलामत

ना इस धुन के होठ सलामत

लँगड़े, बहरे, अंधे मन की

व्याकुल ये कैसी धुन है |


खेल-खिलौने टूटे-फूटे

भरे पोटली चिथड़े-पुथड़े

अत्तल-पत्तल बाँह दबाए

खोले-बाँधे की धुन है |


क्या खोया-पाना, ना पाना

अता-पता न कोई ठिकाना

भरे शहर की अटरी-पटरी

पर गिरती-पड़ती धुन है |


फूटा लोटा, टूटी डोरी

भठे कुएँ पर खड़ा बटोही

बेसुध कंकड़-पत्थर भरती

ये कैसी प्यासी धुन है |


किए-धरे का लेखा-जोखा

झाड़ों ने कब तौला-देखा

काँटों में घायल पंखों की

ज्यों फड़फड़ करती धुन है |


ऐसा होता, वैसा होता

तो आज समय कैसा होता

बीती बातों को धुनने की

बेमतलब गुनती धुन है |


– संतलाल करुण



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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
January 13, 2015

ऐसा होता, वैसा होता तो आज समय कैसा होता बीती बातों को धुनने की बेमतलब गुनती धुन है | सुन्दर पंक्तियाँ हैं

    Santlal Karun के द्वारा
    January 13, 2015

    आदरणीया यमुना जी, गीत की संवेदनात्मक अनुभूति के साथ भाव-भरी प्रेरणा के लिए सहृदय आभार !

sadguruji के द्वारा
January 2, 2015

आदरणीय संतलाल करुण जी ! सादर अभिनन्दन ! आपके ब्लॉग पर मैं नववर्ष की बधाई देने आया हूँ ! आपको और आपके समस्त परिवार को नववर्ष की बहुत बहुत बधाई ! नववर्ष में भी इस मंच पर आपकी महत्वपूर्ण उपस्थिति बानी रहे ! शुभकामनाओं सहित-सद्गुरुजी !

    Santlal Karun के द्वारा
    January 8, 2015

    आदरणीय सद्गुरु जी, आप ने नव वर्ष के आगमन पर याद किया अच्छा लगा | किन्हीं विसंगतियों के कारण विगत कुछ महीनों से जागरण जंक्शन से दूर हूँ, पर अब शीघ्र लौटूँगा | नव वर्ष पर आप और आप के परिवार को हमारी हार्दिक बधाई एवं मंगल कामनाएँ !

Shobha के द्वारा
October 9, 2014

संतलाल जी ऐसा होता , वैसा होता तो आज समय कैसा होता बीती बातों को धुनने की बेमतलब गुनती धुन हैं पूरी कविता ही बहुत सुंदर हैं आखिरी पंक्तिया मुझे बहुत अच्छी लगी शोभा

    Santlal Karun के द्वारा
    October 9, 2014

    आदरणीया शोभा जी, आप के प्रशंसात्मक उद्गार के प्रति हार्दिक आभार !

ranjanagupta के द्वारा
October 9, 2014

आदरणीय संत लाल जी !आपकी कविताओ का एक अलग ही सम्मोहन है !सुन्दर स्वप्निल !सादर !साभार !!

    Santlal Karun के द्वारा
    October 9, 2014

    आदरणीया रंजना जी, सहृदयता भरे उद्गार के प्रति हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
October 9, 2014

मन पर बहुत सुन्दर और लयबद्ध कविता ! अंतिम पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं-ऐसा होता, वैसा होता तो आज समय कैसा होता बीती बातों को धुनने की बेमतलब गुनती धुन है | बहुत बहुत अभिनन्दन और बधाई !

    Santlal Karun के द्वारा
    October 9, 2014

    आदरणीय सद्गुरु जी, आप के मन के प्रतिक्रियात्मक भावों के प्रति हार्दिक आभार !

yamunapathak के द्वारा
October 8, 2014

आदरणीय सर जी आपकी कविताओं की भावपूर्ण सुन्दर धुन हम सब को पसंद आती है. साभार

    Santlal Karun के द्वारा
    October 9, 2014

    आदरणीया यमुना जी, भावप्रवण उद्गार के प्रति हार्दिक आभार !

jlsingh के द्वारा
October 7, 2014

सबकुछ जाने सबकुछ समझे पागल ये फिर भी धुन है औचक टूट गए सपनों की उचटी आँखों की धुन है | आदरणीय श्री संतलाल जी, बीच बीच में आपके बंशी के धुन की प्रतीक्षा रहती है …अकुलाहट भी इक धुन है…

    Santlal Karun के द्वारा
    October 9, 2014

    आदरणीय जे.एल. सिंह जी, भावभरित प्रतिक्रिया के लिए सहृदय आभार !


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