अंतर्नाद

मैंने स्वयं रचा, तुम्हारा अनुभूत सत्य, तुम्हारे लिए ...

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एका अपने देश का

Posted On: 10 Jan, 2015 कविता में

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एका अपने देश का


भारत तेरा रूप सलोना, यहाँ-वहाँ सब माटी सोना |

कहीं पर्वत-घाटी, जंगल, कहीं झरना-झील, समुन्दर

कहीं गाँव-नगर, घर-आँगन, कहीं खेत-नदी, तट-बंजर

कश्मीर से कन्याकुमारी, कामरूप से कच्छ की खाड़ी

तूने जितने पाँव पसारे, एक नूर का बीज है बोना |


इस डाल मणिपुरी बोले, उस डाल मराठी डोले

इस पेड़ पे है लद्दाखी, उस पेड़ पे भिल्लीभिलोडी

कन्नड़-कोयल, असमी-तोता, उर्दू–बुलबुल, उड़िया-मैना

एक बाग के सब हैं पंछी, सब से चहके कोना-कोना |


तमिल खिली है सुन्दर-सी, खिली है मिजो सुघड़-सी

मलयालम कैसी भाती, निकोबारी रंग दिखाती

तेलुगू-गुलाब, गारो-गेंदा, कोंकणी-कमल, आ’ओ-चम्पा

रंग-सुगंध हैं अलग सभी के, सब की माला एक पिरोना |


नेपाली है बायाँ कंधा, दायाँ कंधा पंजाबी

बंगाली बाईं भुजा है, दाईं है भुजा गुजराती

कश्मीरी-आँख, डोगरी-नाक, सिंधी-होठ, हिन्दी-ज़बान

अंग-अंग के रूप अलग हैं, सब में एक ही प्राण सँजोना |


— संतलाल करुण



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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
February 7, 2015

श्री करुण जी यहां आपने हिंदी भाषा का प्रयोग किया है देश का खूबसूरत चित्रण डॉ शोभा

    Santlal Karun के द्वारा
    February 7, 2015

    आदरणीया डॉ. शोभा जी, कविता की आनुभूतिक प्रतिक्रया तथा रचनात्मकता की प्रशंसा के लिए सहृदय आभार !

yamunapathak के द्वारा
January 13, 2015

आदरणीय सर जी ये पंक्तियाँ भौगोलिक भाषायी सांस्कृतिक सौंदर्य का अप्रतिम उदहारण हैं. साभार

    Santlal Karun के द्वारा
    January 13, 2015

    आदरणीया यमुना जी, भौगोलिक भाषायी सांस्कृतिक सौंदर्य पर प्रशंसात्मक उद्गार के लिए हार्दिक आभार !

pkdubey के द्वारा
January 13, 2015

आदरणीय प्राचार्य जी ,बहुत सुन्दर राष्ट्र वर्णन | पर आज देश की परिस्थियाँ बहुत गंभीर हैं ,नदियों में निर्मल नीर नहीं ,काला जहर बह रहा है,हवा भी जहरीली है ,शायद आने वाले समय में मानव को मरने के लिए जहर की नहीं ,हवा पानी ही काफी होगा और दूषित हवा ,पानी मिलने पर अनाज भी जहरीला ही होगा | बाबाओं का तमाशा तो राष्ट्र देख ही रहा है और उनके समर्थकों का नंगनाच भी |

    Santlal Karun के द्वारा
    January 13, 2015

    आदरणीय दुबे जी, राष्ट्र-वर्णन की प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद ! नकारात्मक तथ्य अपनी जगह सही हैं | पर हम सकारात्मकता की खोज का कार्य कैसे छोड़ सकते हैं ? वैसे भी संसार अनंत है, उसका नियंता अनंत है, मानव-निर्मित विसंगतियाँ स्थायी नहीं हो सकतीं | इसलिए हमें आशा का पल्लू नहीं छोड़ना चाहिए |

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
January 12, 2015

आदरणीय संत लाल जी ,आज दर्शन हुए गीत अभिव्यक्ति अच्छी लगी किन्तु थोड़ी त्रुटि लगती है | नेपाल देश अलग है | नेपाल की जगह उत्तराखंड होना चाहिए था | ओम शांति शांति

    Santlal Karun के द्वारा
    January 13, 2015

    आदरणीय पापी जी, अभिवक्ति की प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद ! नेपाल एक अलग देश अवश्य है, किन्तु वह भारत का सांस्कृतिक अंग है | नेपाली ‘भारोपीय परिवार’ की ‘भारतीय आर्य भाषा-शाखा’ की भाषा है ( कुछ विद्वान इसे ‘तिब्बती-बर्मेली’ समूह के अंतर्गत रखते हैं ) | उसकी गणना आधुनिक भारतीय भाषाओं में होती है, क्योंकि ‘खश’ अपभ्रंश से पहाड़ी भाषाएँ विकसित हुई हैं और ‘पूर्वी पहाड़ी’ की प्रधान बोली नेपाली ही है, जिसे ‘खसखुरा’ या ‘गुरखाली’ भी कहते हैं | नेपाली का अन्य आधुनिक भारतीय भाषाओं पर तथा आधुनिक भारतीय भाषाओं जैसेकि हिन्दी, सिंधी, राजस्थानी आदि पर नेपाली का यथेष्ट प्रभाव है | और तो और भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में नेपाली को भी सादर स्थान दिया गया है | नेपाल की सत्ता अलग होने और नेपाल की राजभाषा होने से नेपाली का भारत के लिए महत्त्व कम नहीं हो जाता, बल्कि राजनैतिक और क्षेत्रीय दृष्टि से उसकी महत्ता हमें और अधिक प्रभावित करती है |

    PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
    January 14, 2015

    आदरणीय संत लाल जी आभार आपका बहुत सुन्दर ज्ञान वर्धक प्रतिउत्तर । सत्य जो भी हो किंतु आज आपकी राजनीतिक प्रतिभा के भी दर्षन हो गये । क्रतार्थ होते ओम शांति शांति

jlsingh के द्वारा
January 11, 2015

आदरणीय श्री संतलाल जी, सादर अभिवादन! काफी दिनों के बाद आपका दर्शन पा धन्य हुआ और वह भी भारत की विविधता के साथ! अंग-अंग के रूप अलग हैं, सब में एक ही प्राण सँजोना |… बहुत ही सुन्दर!

    Santlal Karun के द्वारा
    January 13, 2015

    आदरणीय जे.एल. सिंह जी, कुछ विसंगतियों के कारण जागरण जंक्शन से दूर होना विवशता थी | पर अब लौटा हूँ, तो धीमी ही सही, लेकिन उपस्थिति बनी रहेगी | प्रशंसा भरे भाव के लिए हार्दिक आभार !


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