अंतर्नाद

मैंने स्वयं रचा, तुम्हारा अनुभूत सत्य, तुम्हारे लिए ...

64 Posts

1148 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 12407 postid : 835791

दिल या ख़ुदा मिलता नहीं

Posted On: 14 Jan, 2015 कविता में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

दिल या ख़ुदा मिलता नहीं


दिल के मकाँ में यार कोई दिलकुशा मिलता नहीं

भीगा पड़ा है आशियाँ अब दिलशुदा मिलता नहीं |


हमने वफ़ा में बाअदब जानो-ज़िगर सब दे दिया

उनकी वफ़ा, चश्मो-अदा, दिल गुमशुदा मिलता नहीं |


उम्मीद हमने छोड़ दी उनकी इनायत पे बसर

ये ज़िन्दगी रहमत-गुज़र दिल या ख़ुदा मिलता नहीं |


उनकी वफ़ा के माजरे, बेबस्तगी पे क्या कहें

उन पे फ़ना दिल रोज़ होता दिल जुदा मिलता नहीं |


यों दिलज़दा मेरा फ़साना, दिल लगाना बेक़दर

जो लापता ढूढें कहाँ दिल गुम हुआ मिलता नहीं |


— संतलाल करुण



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (6 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

29 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
February 7, 2015

श्री करुण जी गजलों या कविताओं में जो नफासत होती है वह मेरे समझ कम आती है क्योंकि मैं राजनीति की विद्यार्थी हूँ परन्तु मैने जब आपकी गजलें पढ़ीं मुझे फ़ारसी की गजलें याद आ गई आप बहुत सुंदर शब्दों का इस्तेमाल करते हैं दिलकुशा शब्द शायद दिलख़ुशां हैं मैं गलत भी हो सकती हूँ मैने यह शब्द बातचीत में सुना है डॉ शोभा

    Santlal Karun के द्वारा
    February 7, 2015

    आदरणीया डॉ. शोभा जी, अरबी-फारसी के वे शब्द जो हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में प्रचलन में हैं, प्राय: वही हमारे लिए मायने रखते हैं | ‘दिलखुश’ और ‘दिलखुशकुन’ शब्द तो यहाँ वज़ूद में है, लेकिन ‘दिलखुशां’ मेरी समझ से बाहर है, जैसा आप के अनुभव में आया है | लखनऊ में कैंट से जुड़ा एक दिलकुशा एरिया है, जहाँ 1800 ई. में निर्मित प्रसिद्ध ‘दिलकुशा कोठी’ है, जिसे गूगल पर सर्च करके देखा जा सकता है | ‘दिलकुशा’ का अर्थ है — मनोहर , सुहावना, आनंदप्रद | आभिप्रयिक अर्थ में जाएँगे तो कहना होगा– ‘दिलकुशा’ का मतलब है दिल को खोलनेवाला | ग़ज़ल की गहराई में उतरने के लिए सहृदय आभार !

pkdubey के द्वारा
February 2, 2015

सादर साधुवाद एवं कोटिशः आभार आदरणीय , मैंने डरते -डरते पूंछ ही लिया, आप की व्याख्या से सारे भ्रम मिट गए ,मैं सोच रहा था ,दिल में रहने वाला ,इसीलिये बाबा तुलसी ने लिखा -होइ न विमल विवेक उर गुर सन किये दुराव || सादर नमन |

pkdubey के द्वारा
January 23, 2015

आदरणीय ,मैंने आप की रचना को कई बार पढ़ा ,पर मैं दिलकुशा शब्द को समझ नहीं पा रहा .कृपया इस शब्द को समझाने का कष्ट करें | सादर आभार |

    Santlal Karun के द्वारा
    January 31, 2015

    आदरणीय दुबे जी, जालंधर में ‘दिलकुशा मार्केट’ है – यह जानकारी मुझे समाचारों के माध्यम से है, विस्तृत जानकारी नहीं है | लखनऊ में एक दिलकुशा एरिया है, कैंट एरिया से जुड़ा, उसी के आसपास और उसी क्षेत्र में गोमती नदी के तट पर 1800 ई. में निर्मित प्रसिद्ध ‘दिलकुशा कोठी’ है, जिसे गूगल पर सर्च करके देखा जा सकता है | सामान्यतया ‘दिलकुशा’ का अभिप्राय है दिल जहाँ खुश हो | ‘दिलकुशा’ शब्द ‘खुले हृदयवाला’, ‘उदार हृदय’ – जैसे अर्थों-अभिप्रायों के साथ प्रयुक्त हुआ है | कुछ उदाहरण दृष्टव्य हैं — “अराइश-ए-ख्याल भी हो दिलकुशा भी हो/ वह दर्द अब कहाँ जिसे जी चाहता भी हो | जल्वा अयाँ है कुदरत-ए-परवर दिगार का/ क्या दिलकुशा ये सीन है फ़स्ल-ए-बहार का | गरचे है दिलकुशा बहुत हुस्न-ए-फरंग की बहार/ ताएरक-ए-बुलंद बाल दानो-दाम से गुजर |”

sadguruji के द्वारा
January 21, 2015

उम्मीद हमने छोड़ दी उनकी इनायत पे बसर ये ज़िन्दगी रहमत-गुज़र दिल या ख़ुदा मिलता नहीं | बहुत खूब ! आदरणीय संतलाल करुण जी ! लाजबाब ग़ज़ल ! बहुत बहुत बधाई !

    Santlal Karun के द्वारा
    January 21, 2015

    आदरणीय सद्गुरु जी, ग़ज़ल आप को पसंद आई — अच्छा लगा | तारीफ़ के लिए सहृदय आभार !

aman kumar के द्वारा
January 21, 2015

लापता ढूढें कहाँ दिल गुम हुआ मिलता नहीं | रस से भरपूर ! आभार

    Santlal Karun के द्वारा
    January 21, 2015

    आदरणीय अमन कुमार जी, रसानुभूति के लिए आभार !

yamunapathak के द्वारा
January 19, 2015

सर जी ये एक से बढ़ कर एक शेर हैं साभार

    Santlal Karun के द्वारा
    January 19, 2015

    आदरणीया यमुना जी, शे’र आप को पसंद आए, श्रम सार्थक हुआ, सहृदय आभार !

January 18, 2015

bahut bhavnatamk abhivyakti .badhai

    Santlal Karun के द्वारा
    January 19, 2015

    आदरणीया शालिनी जी, भावपूर्ण प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार !

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
January 18, 2015

ये ज़िन्दगी रहमत-गुज़र दिल या ख़ुदा मिलता नहीं |-bahut khoob .badhai

    Santlal Karun के द्वारा
    January 19, 2015

    आदरणीया शिखा जी, तारीफ़ के लिए हार्दिक आभार !

TEJ PAL SINGH के द्वारा
January 18, 2015

सर, नमस्कार। उम्दा प्रस्तुति। दिल के मकाँ में यार कोई दिलकुशा मिलता नहीं, भीगा पड़ा है आशियाँ अब दिलशुदा मिलता नहीं | बहुत सुुन्र्दर शब्द संयोजन।

    Santlal Karun के द्वारा
    January 19, 2015

    आदरणीय टी.पी. सिंह जी, शब्द-संयोजन की प्रशंसा के लिए हार्दिक आभार !

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
January 17, 2015

संत लाल जी अभिवादन क्यों उदास हैं जब मोदी और किरण मिल सकते हैं तो दिल मिलना ही कहा जायेगा | हिंदुस्तान मैं तो आत्म साक्षात्कार सुगमता से हो ही जाता है । ओम शांति शांति हिंदु होते होती जाती है 

    Santlal Karun के द्वारा
    January 19, 2015

    आदरणीय पापी जी, आप की भौतिक एवं स्थूल जानकारी के लिए हार्दिक आभार !

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
January 17, 2015

श्रद्धेय वर , सादर ! लाजवाब !!

    Santlal Karun के द्वारा
    January 19, 2015

    आदरणीय गुंजन जी, श्लाघात्मक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

आर.एन. शाही के द्वारा
January 17, 2015

सर जी प्रणाम । आप तो कमाल के शायर भी हैं । आदाब बजा लाता हूँ ।

    Santlal Karun के द्वारा
    January 19, 2015

    आदरणीय शाही जी, आप के मन के प्रतिक्रियात्मक भावों के प्रति हार्दिक आभार !

Imam Hussain Quadri के द्वारा
January 16, 2015

bahut hi khubsurat gazal

    Santlal Karun के द्वारा
    January 19, 2015

    आदरणीय कादरी जी, ग़ज़ल की तारीफ के लिए सहृदय आभार !

jlsingh के द्वारा
January 15, 2015

आदरणीय संतलाल जी, सादर अभिवादन! काफी दिनों बाद अवतरित हुए हैं बेहतरीन प्रस्तुति लेकर! उधर OBO पर भी देखा था फिर अंतर्ध्यान! दर्शन देते रहें ये मेरा आग्रह है!

    Santlal Karun के द्वारा
    January 19, 2015

    आदरणीय जे.एल.सिंह जी, धीमी ही सही पर उपस्थिति बनी रहने की मेरी भी इच्छा रहती है | प्रेरक उद्गार के प्रति हार्दिक आभार !

Bhola nath Pal के द्वारा
January 14, 2015

श्री संत लाल जी !आप बहुत अच्छा लिखते हैं I नक़ल के बाहर i प्रयाश करना भी व्यर्थ है i शिल्प की प्रसंशा न करना कला का अपमान होगा i धन्यवाद ……..

    Santlal Karun के द्वारा
    January 19, 2015

    आदरणीय पाल जी, आप की सराहना भरी प्रतिक्रिया से सृजन का आनंद दुगुना हो गया; सहृदय आभार !


topic of the week



latest from jagran