अंतर्नाद

मैंने स्वयं रचा, तुम्हारा अनुभूत सत्य, तुम्हारे लिए ...

64 Posts

1148 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 12407 postid : 840415

माँ, बहन, बेटी के आँसू

Posted On: 22 Jan, 2015 social issues,कविता में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

माँ, बहन, बेटी के आँसू


माँ, बहन, बेटी के आँसू पे यहाँ रोता है दिल

रोज़ लुटती अस्मतें, क़त्लों का ग़म ढोता है दिल |


आबरू को उम्रदारों ने भी बदसूरत किया

मर्दों का बचपन भी है बदकार बद होता है दिल |


शाहो-साहब औ’ गँवारों सब में बद शह्वानीयत

सब की आँखों में चढ़ा शर्मो-हया खोता है दिल |


है हुक़ूमत बेअसर बेख़ौफ़ हैं ज़ुल्मो-ज़बर

हर घड़ी हर साँस जैसे ख़ार पे सोता है दिल |


आज भी शै की तरह हैं घर या बाहर औरतें

बेरहम इंसाफ़ भी तेज़ाब से धोता है दिल |


– संतलाल करुण



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (4 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

6 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

February 11, 2015

आज भी शै की तरह हैं घर या बाहर औरतें बेरहम इंसाफ़ भी तेज़ाब से धोता है दिल | सारी ग़ज़ल का सार हैं ये पंक्तियाँ और सच्चाई का अक्स.बहुत सही लिखा है आपने .

    Santlal Karun के द्वारा
    February 15, 2015

    आदरणीया शालिनी जी, तथ्यपरक और तदात्मक प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार !

Shobha के द्वारा
February 7, 2015

श्री करुण जी इस बात का दुःख है मैं आपकी गजलों को पढ़ने से वंचित रह गई ब्यान नहीं कर सकती कितने सुंदर भाव हैं डॉ शोभा

    Santlal Karun के द्वारा
    February 7, 2015

    आदरणीया डॉ. शोभा जी, ग़ज़ल को निष्ठा भरी दृष्टि के साथ पढ़ने और प्रशंसात्मक उद्गार के लिए हार्दिक आभार !

pkdubey के द्वारा
January 23, 2015

आज के युग में नारी मात्र भोग की वस्तु समझी जा रही है ,जो बहुत दुखद है आदरणीय ,आप की कृति के प्रत्येक शब्द में बहुत बेदना निहित है |सादर |

    Santlal Karun के द्वारा
    January 31, 2015

    आदरणीय दुबे जी, आप ने रचना में व्यक्त पीड़ा पर आनुभूतिक प्रतिक्रिया दी; हार्दिक आभार !


topic of the week



latest from jagran