अंतर्नाद

मैंने स्वयं रचा, तुम्हारा अनुभूत सत्य, तुम्हारे लिए ...

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दिल के आँसू पे यों फ़ातिहा पढ़ना क्या

Posted On: 5 Feb, 2015 कविता में

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दिल के आँसू पे यों फ़ातिहा पढ़ना क्या


दिल के आँसू पे यों फ़ातिहा पढ़ना क्या वो न बहते कभी वो न दिखते कभी

तर्जुमा उनकी आहों का आसाँ नहीं आँख की कोर से क्या गुज़रते कभी |


खैरमक्दम से दुनिया भरी है बहुत आदमी भीड़ में कितना तनहा मगर

रोज़े-बद की हिकायत बयाँ करना क्या लफ़्ज़ लब से न उसके निकलते कभी |


बात गर शक्ल की मशविरे मुख्तलिफ़ दिल के रुख़सार का आईना है कहाँ

चोट बाहर से गुम दिल के भीतर छिपे चलते ख़ंजर हैं उसपे न रुकते कभी |


जिस्म का ज़ख्म भर दे ज़माना मगर ज़ख्म दिल का कभी भी है भरता नहीं

रूह के साथ जाते हैं ज़ख्मेज़िगर सफ्हए-ज़ीस्त से वो न मिटते कभी |


आँसुओं की लड़ी टूट जाने पे भी जो गए याद उनकी है जाती नहीं

याद जलती है सीने में जब बाफ़ज़ा रातें होती नहीं दिन न ढलते कभी |


दर्द ऐसी जगह जो परीशानकुन दिल के दरम्यान ही घर बनाता कहीं

वक्त की चादरों से ढका बेतरह पर ख़लिश से दिलोदम न बचते कभी |


– संतलाल करुण

शब्दार्थ :

सफ्हए-ज़ीस्त = जीवन-पृष्ठ

बाफ़ज़ा = वातावरण पाने पर, माहौल के साथ, खुलापन मिलने पर



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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
February 15, 2015

सर्वोत्तम से बड़ा कोई शब्द है तो वह भी दिया जाय इतनी खूबसूरत रचना को …अपनी उपस्थिति बनाये रक्खे आदरणीय संतलाल सर!

    Santlal Karun के द्वारा
    February 15, 2015

    आदरणीय जे.एल. सिंह जी, आप की श्लाघात्मक प्रतिक्रिया से मन अभिभूत हो उठा; हार्दिक आभार !

yamunapathak के द्वारा
February 10, 2015

आदरणीय सर जी बेहतरीन शेर हैं शब्दावली उत्कृष्ट साभार

    Santlal Karun के द्वारा
    February 10, 2015

    आदरणीया यमुना जी, प्रशंसात्मक एवं प्रेरक उद्गार के लिए हार्दिक आभार !

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
February 9, 2015

अदब ऐसी कि उर्दूदां भी सकते में आ जाएं ! आप और आप की गज़लें दोनों ही उत्तमोत्तम हैं ! आप को बधाई आदरणीय करुण जी ! सादर !

    Santlal Karun के द्वारा
    February 9, 2015

    आदरणीय गुंजन जी, आप की तारीफ़ से दिल भर आया है, सहृदय आभार !

February 7, 2015

जिस्म का ज़ख्म भर दे ज़माना मगर ज़ख्म दिल का कभी भी है भरता नहीं रूह के साथ जाते हैं ज़ख्मेज़िगर सफ्हए-ज़ीस्त से वो न मिटते कभी | bahut sahi kah diya karun ji aapne .sachchai hai yah.

    Santlal Karun के द्वारा
    February 8, 2015

    आदरणीया शालिनी जी, ग़ज़ल पसंद करने के लिए हार्दिक आभार !

Shobha के द्वारा
February 7, 2015

श्री करुण जी बेहद खूबसूरत गजल जिसमें फ़ारसी के शब्दों को खूबसूरती से पिरोया गया है बहुत वर्ष ईरान में रहीं हूँ इसलिए आपकी गजल की नफासत को बहुत अच्छी तरह समझने की कोशिश करती हूँ डॉ शोभा

    Santlal Karun के द्वारा
    February 7, 2015

    आदरणीया डॉ. शोभा जी, देश-दुनिया को देखने-समझने के अनुभव से सम्पन्न आप-जैसी विदुषी द्वारा मेरी ग़ज़ल की कद्रदानी मेरे लिए रेगिस्तान में भारी बारिश के समान है | ग़ज़ल को अकीदत के साथ पढ़ने और बारीकियों पर गौर करने के लिए सहृदय आभार !

pkdubey के द्वारा
February 7, 2015

आप की बात तो एकदम सटीक है ,आदरणीय ,सादर |

    Santlal Karun के द्वारा
    February 7, 2015

    आदरणीय दुबे जी, भावपूर्ण प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार !

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
February 6, 2015

करुणामयी अंंतर्नाद …स्वयं रचा, तुम्हारा अनुभूत सत्य, तुम्हारे लिए …..आप संत हैं सह सकते हैं …हम तो ओम शांति शांति जपते ध्यानमग्न हो जायेंगे ।

    Santlal Karun के द्वारा
    February 7, 2015

    आदरणीय हरिश्चंद्र जी, ध्यानमग्नता भी सहनशीलता का ही संस्कार है | आनुभूतिक प्रतिक्रया के लिए सहृदय आभार !


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