अंतर्नाद

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बिच्छू के डंक-से ये दिन

Posted On: 12 Feb, 2015 Others,social issues,कविता में

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बिच्छू के डंक-से ये दिन


बिच्छू के डंक-से दिन ये खलते रहे

सर्प के दंश-सी रातें खलती रहीं

बंद पलकों में ले दर्द सारा पड़े

नव सृजन-सर्ग की आस पलती रही  |


अहं से हृदय काँटा हुआ जा रहा

द्वेष-दावाग्नि घर-बार पकड़े हुए

भोग की यक्ष्मा भीतर घर कर गई

रात-दिन बुद्धि के ज्वर से हम तप रहे

जैसे बढ़ते ज़हरबाद का हो असर

क्रूरता-नीचता मन की बढ़ती रही |


आँख काढ़े-सा शैतान विज्ञान का

पीसकर दाँत आगे खड़ा हो रहा

महामारी-सा रुतबा है आतंक का

डंका छलबल का चारों तरफ बज रहा

बाह्य विभुता का ऊपर से छाया नशा

दर्प-कंदर्प की हाँक चलती रही |


धृष्टता-भ्रष्टता का मुकुट सिर धरे

न्याय को पंख जैसे गरुण का लगा

शान्ति-करुणा की अर्थी उठाते हुए

भीम का कंधा ज्यों हो दुराचार का

धर्म का दर्भ मरुभूमि में जल रहा

होलिका सत्य की नित्य जलती रही |

.

— संतलाल करुण

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20 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
February 19, 2015

आँख काढ़े-सा शैतान विज्ञान का पीसकर दाँत आगे खड़ा हो रहा महामारी-सा रुतबा है आतंक का डंका छलबल का चारों तरफ बज रहा बाह्य विभुता का ऊपर से छाया नशा दर्प-कंदर्प की हाँक चलती रही | उच्च स्तरीय रचना आदरणीय श्री करुणजी !

    Santlal Karun के द्वारा
    February 19, 2015

    आदरणीय सारस्वत जी, प्रेरणात्मक प्रतिक्रिया के लिए हृदयपूर्वक आभार !

deepak pande के द्वारा
February 18, 2015

धर्म का दर्भ मरुभूमि में जल रहा होलिका सत्य की नित्य जलती रही bahut khoob aadarniya karun jee

    Santlal Karun के द्वारा
    February 18, 2015

    आदरणीय पाण्डेय जी. प्रेरणात्मक उद्गार के लिए सहृदय आभार !

तेज पाल सिंह के द्वारा
February 17, 2015

धृष्टता-भ्रष्टता का मुकुट सिर धरे, न्याय को पंख जैसे गरुण का लगा। आदरणीय प्राचार्य जी, वास्तव में समाज की सच्ची तस्वीर पेश करती  है, आपकी कविता । न जाने मनुष्य को, समाज को क्या हो गया है? किस दिशा में हम आगे बढ़ रहे है? नैतिकता, ईमानदारी, सच्चाई जाने कहाँ खो गई है? समाज की दशा और दिशा पर सोचने को विवश करती है, आपकी कविता । एक अच्छी प्रस्तुति के लिए आभार ।

    Santlal Karun के द्वारा
    February 17, 2015

    आदरणीय तेजपाल सिंह जी, कविता में व्यक्त समाज की यथार्थपरक विसंगति पर प्रतिक्रया देने और मनोबल बढाने के लिए हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
February 17, 2015

धृष्टता-भ्रष्टता का मुकुट सिर धरे न्याय को पंख जैसे गरुण का लगा शान्ति-करुणा की अर्थी उठाते हुए भीम का कंधा ज्यों हो दुराचार का धर्म का दर्भ मरुभूमि में जल रहा होलिका सत्य की नित्य जलती रही | बहुत प्रभावी और विचारणीय रचना ! मंच पर इस सर्वोत्तम प्रस्तुति के लिए हार्दिक आभार !

    Santlal Karun के द्वारा
    February 17, 2015

    आदरणीय सद्गुरु जी, आप की प्रेरणा और उत्साहवर्धन के सहृदय आभार !

jlsingh के द्वारा
February 16, 2015

देख वर्तमान दृश्य, आभासी सा भविष्य, कविता कवि के मन को मथती रही — ऐसे ही एक कोशिश भर की है … जो चित्र आपने खींचा है, सत्य का बिम्ब ही तो है… आदरणीय संतलाल जी सर! स्तरीय उच्च कोटि की कविता/रचना आपके माध्यम से इस मंच की महत्ता को द्विगुणित करता है. …सादर!

    Santlal Karun के द्वारा
    February 17, 2015

    आदरणीय जे.एल. सिंह जी, कविता पढ़ने और उत्प्रेरक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
February 14, 2015

आदरणीय संत लाल जी सत्य सत्य है करुणामय होकर दुखों का अंत नहीं हो सकता है गीता मैं भगवन कृष्ण ने कहा है यह सब भूतों के समुदाय हैं जो प्रक्रति के आरंभ मैं मुझ परमात्मा से पैदा होते हैं और अंत मैं मुझ भगवन मैं विलीन हो जाते हैं अतः ओम शांति शांति जपकर शांति पाओ

    Santlal Karun के द्वारा
    February 15, 2015

    आदरणीय हरिश्चंद्र जी , पैदा होने और विलीन होने की क्रिया-प्रक्रिया ‘एको अहं बहुस्याम्’ की मौलिक इच्छा से घटित होती है, जिससे प्रेम, सहभाव, करुणा आदि मनोभावों को संसार में प्रतिफलित होने का अवसर मिलता है | ब्लॉग पर आने और प्रासंगिक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

Bhola nath Pal के द्वारा
February 14, 2015

बहुत अच्छा लिखते हैं आप .जी नहीं भरता .और लिखिए सादर…………

    Santlal Karun के द्वारा
    February 15, 2015

    आदरणीय पाल जी, प्रेरणात्मक प्रतिक्रिया के लिए हृदयपूर्वक आभार !

Shobha के द्वारा
February 14, 2015

श्री करूँ जी पूरी कविता बहुत सुंदर हैं सच के करीब हैं आज के हालात को दर्शाती हैं यह लाइने पूरी कविता का सार हैं धर्म का दर्भ मरुभूमि में जल रहा होलिका सत्य की नित जलती रही डॉ शोभा

    Santlal Karun के द्वारा
    February 15, 2015

    आदरणीया डॉ. शोभा जी, रचना की प्रशंसा के लिए सहृदय आभार !

yamunapathak के द्वारा
February 13, 2015

आदरणीय सर जी सार गर्भित पंक्तियाँ होलिका सत्य की नित्य जलती रही. साभार

    Santlal Karun के द्वारा
    February 15, 2015

    आदरणीया यमुना जी, प्रशंसात्मक उद्गार के प्रति हार्दिक आभार !

pkdubey के द्वारा
February 13, 2015

adbhut aadaarneey,sadar aabhaar.

    Santlal Karun के द्वारा
    February 15, 2015

    आदरणीय दुबे जी, भावपूर्ण प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार !


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