अंतर्नाद

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प्रकृति-कथा

Posted On: 15 Jun, 2015 कविता में

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प्रकृति-कथा


एक सर्प ने समझ मूषिका

ज्यों पकड़ा एक छछुंदर को

उसी समय एक मोर झपट

कर दिया चोंच उस विषधर को |


फिर मोर भी हुआ धराशायी

घायल जो किया व्याध-शर ने

पर व्याध निकट जैसे पहुँचा

डस लिया व्याध को फणधर ने |


शेष रही बस छद्म-सुन्दरी

सृष्टि-रूप धर जीवन-थल पर

और सभी अंधे हो-होकर

नियति-भक्ष बन गए परस्पर |


– संतलाल करुण

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shakuntlamishra के द्वारा
June 23, 2015

शेष रही बस छद्म सुंदरी /नियति भक्ष बन गए परस्पर ! यही नियम है काल का हम सब विवश है ! बहुत खूब ! करुण जी

    Santlal Karun के द्वारा
    June 23, 2015

    आदरणीया मैडम, समर्थन भरी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
June 20, 2015

आदरणीय संतलाल करुण जी ! इतनी सुन्दर और सारगर्भित कविता के लिए हार्दिक बधाई ! आपने सही कहा है कि छदम रूप धारण करके नियति सबका भक्षण कर रही है ! अंतिम चार पंक्तियाँ शाश्वत और लाजबाब हैं- शेष रही बस छद्म-सुन्दरी सृष्टि-रूप धर जीवन-थल पर और सभी अंधे हो-होकर नियति-भक्ष बन गए परस्पर ! इस सुन्दर और सार्थक रचना के लिए आपका बहुत बहुत अभिनन्दन !

    Santlal Karun के द्वारा
    June 22, 2015

    आदरणीय सद्गुरु जी, स्पष्ट है कि आप ने ‘प्रकृति-कथा’ गंभीरता के साथ पढी है | आप की श्लाघात्मक प्रतिक्रियाएँ एवं प्रेरक उद्गार रचनात्मक ऊर्जा प्रदान करते हैं … सहृदय आभार !

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
June 19, 2015

आदरणीय श्री संतलाल करूण जी, ” प्रकृति कथा ” आपकी यह छोटी सी कविता पढ कर मन प्रशन्न हुआ । बहुत सुंदर लिखा है आपने । बधाई स्वीकार करें

    Santlal Karun के द्वारा
    June 22, 2015

    आदरणीय बिष्ट जी, ‘पृकृति-कथा’ प्रर आह्लाद के लिए हार्दिक आभार !

anilkumar के द्वारा
June 17, 2015

आदरणीय संतलाल जी , बहुत समय बाद अंतर्नाद गूंजा है । बहुत सुखद अनुभूति हो रही है ।  प्रकृति-कथा के माद्धम से जीवन का सत्य अभिव्यक्त किया । बहुत सुन्दर । बहुत बहुत बधाई । 

    Santlal Karun के द्वारा
    June 22, 2015

    आदरणीय अनिल कुमार जी, व्यस्तता के कारण ब्लॉग पर आना आज कल कठिन हो रहा है | पर मन की प्रबलता है कि पूरी तरह विराम भी नहीं लगा है | आप ने ‘प्रकृति-कथा’ पढी, सराहा, बहुत-बहुत धन्यवाद !


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