अंतर्नाद

मैंने स्वयं रचा, तुम्हारा अनुभूत सत्य, तुम्हारे लिए ...

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विरह-हंसिनी

Posted On: 24 Jul, 2015 कविता में

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विरह-हंसिनी


विरह-हंसिनी हवा के झोंके

श्वेत पंख लहराए रे !

आज हंसिनी निठुर, सयानी

निधड़क उड़ती जाए रे !


अब तो हंसिनी, नाम बिकेगा

नाम जो सँग बल खाए रे !

होके बावरी चली अकेली

लाज-शरम ना आए रे !


धौराहर चढ़ राज-हंसनी,

किससे नेह लगाए रे !

कोटर आग जले धू-धूकर

क्यों न उसे बुझाए रे !


ओरे ! हंसिनी, रंगमहल से

कहाँ तू नयन उठाए रे !

जिस हंसा के फाँस-फँसी

कोई  उसका सच ना पाए रे !


सच तो एक ही, सुन रे, बतंगड़ !

तू ही भरम फैलाए रे !

क्षिति, जल, अनल, गगन, पवन

वही एक करत बिखराए रे !


— संतलाल करुण



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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
July 29, 2015

 आदरणीय संत लाल जी अंतर्नाद मैंने स्वयं रचा, तुम्हारा अनुभूत सत्य, तुम्हारे लिए……विरह-हंसिनी…..की करुणा कौन समझे ,जब विरह अग्नि से धधकेंगे तो समझेंगे ओम शांति शांति

    Santlal Karun के द्वारा
    July 31, 2015

    आदरणीय हरिश्चंद्र जी, अब जागरण जंक्शन प्रतिक्रिया व्यक्त करने में भी अड़ंगे खड़ा करने लगा है | प्रतिक्रियाएँ एक तो मिलती नहीं और सब-मिट करने की पेचीदगी के कारण एक ही प्रतिक्रिया कई बार सब-मिट हो जाती है |

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
July 29, 2015

संत लाल जी अंतर्नाद मैंने स्वयं रचा, तुम्हारा अनुभूत सत्य, तुम्हारे लिए……विरह-हंसिनी…..की करुणा कौन समझे ,जब विरह अग्नि से धधकेंगे तो समझेंगे ओम शांति शांति 

    Santlal Karun के द्वारा
    July 31, 2015

    आदरणीय हरिश्चंद्र जी, आप की प्रेरणा वैचारिकता को बल देती रहती है, हार्दिक आभार !

Shobha के द्वारा
July 28, 2015

मेरे लेख मुझे कुछ कहना है की प्रतिक्रिया के उत्तर में श्री सद्गुरु जी के विचार पठनीय अनुभव यही कहता है कि उनके पास रीडर ब्लॉग के अनेकों सर्वश्रेष्ठ लेखकों जैसे एक भी लेखक नहीं हैं ! क्या जागरण ब्लॉग पर रीडर ब्लॉग के सिर्फ दो ब्लॉगर आदरणीय संतलाल करुण जी और आदरणीया यमुना पाठक जी के मुकाबले का कोई लेखक है ? मैं तो उनके मुकाबले का कोई लेखक नहीं पाया

    Santlal Karun के द्वारा
    July 31, 2015

    आदरणीया शोभा जी, अकिंचन को इतना मान देने के लिए हृदयपूर्वक आभार व्यक्त करता हूँ | देश-दुनिया में एक-से एक विचारक-लेखक हैं, जागरण जंक्शन पर भी ऐसे अनेक ब्लॉगर हैं, जिन पर गर्व किया जा सकता है; पर आप की दृष्टि में एक विशेष स्थान पाना हमारा सौभाग्य है | आप द्वारा इस प्रकार से सम्मान से अभिभूत हूँ |

Shobha के द्वारा
July 28, 2015

श्री आदरणीय संत लाल जी भर समय बाद आपको ब्लॉग पर देखा आपके द्वारा लिखी कविता पढ़ने को मिली सच तो एक ही, सुन रे, बतंगड़ ! तू ही भरम फैलाए रे ! क्षिति, जल, अनल, गगन, पवन वही एक करत बिखराए रे अति सुंदर

    Santlal Karun के द्वारा
    July 31, 2015

    आदरणीया शोभा जी, उत्प्रेरणा भरी प्रतिक्रिया के लिए सहृदय आभार !

shakuntlamishra के द्वारा
July 27, 2015

jis hansa ke fans fansi koi uska sach na paaye re bahut achchha santlal ji badhi

    Santlal Karun के द्वारा
    July 31, 2015

    आदरणीया शकुन्तला मैडम, प्रेरित करने के लिए सहृदय आभार !

Dr. D K Pandey के द्वारा
July 26, 2015

हंसिनी

    Santlal Karun के द्वारा
    July 31, 2015

    आदरणीय के पी पाण्डेय जी, आभार !

sadguruji के द्वारा
July 25, 2015

ओरे ! हंसिनी, रंगमहल से कहाँ तू नयन उठाए रे ! जिस हंसा के फाँस-फँसी कोई उसका सच ना पाए रे ! सच तो एक ही, सुन रे, बतंगड़ ! तू ही भरम फैलाए रे ! क्षिति, जल, अनल, गगन, पवन वही एक करत बिखराए रे ! आदरणीय संतलाल करुण जी ! बहुत सुन्दर और विचारणीय कविता ! इसकी आध्यात्मिक छुअन ह्रदय को आनंद से पुलकित और अभिभूत कर दी ! बेहतरीन प्रस्तुति के लिए सादर आभार !

    Santlal Karun के द्वारा
    July 31, 2015

    आदरणीय सद्गुरु जी, आप की प्रेरणा अच्छे-से-अच्छा लिखने की सारस्वत ऊर्जा देती है, सहृदय आभार !


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