अंतर्नाद

मैंने स्वयं रचा, तुम्हारा अनुभूत सत्य, तुम्हारे लिए ...

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देहियाँ पे गाढ़ा चुंबन

Posted On: 5 Sep, 2015 Others,कविता में

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देहियाँ पे गाढ़ा चुंबन


जड़ दिहला हो, रामा ! जड़ दिहला

सगरौ देहियाँ पे गाढ़ा चुंबन, जड़ दिहला |


हथवौ से जड़िला, नजरियौ से जड़िला

बहियाँ में लइके अँकवरियौ से जड़िला

अंगै-अंग होंठवा मुहर किहला |


उरौ पे जड़िला, उर-फुलवौ पे जड़िला

अँगुरियन कै टोहवा कुछ नहिं छोड़िला

पोरै-पोर रसवा भर दिहला |


हियवा कै छपवा हियरवा में उतरल

मनुआँ कै हिरना चेहरवा पे उछरल

सेजिया इंद्र-धनुसवा कर दिहला |


रामै कै देह, रामै तोहरा चुंबन

रामहि बरनवा, राम-रसरी में दुइ तन

सौ-सौ जनमवा रामा ! हर लिहला |


– संतलाल करुण



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
September 8, 2015

रामै कै देह, रामै तोहरा चुंबन रामहि बरनवा, राम-रसरी में दुइ तन सौ-सौ जनमवा रामा ! हर लिहला | ● आदरणीय संतलाल करुण जी ! बहुत अच्छी रचना ! भोजपुरी में लिखी सुन्दर रचना ! पूरी तरह से गेय और लयबद्ध ! बहुत बहुत अभिनन्दन और हार्दिक बधाई !

    Santlal Karun के द्वारा
    September 8, 2015

    आदरणीय सद्गुरु जी, आप ने रचना देखी | इसके भोजपुरी रूप-स्वरूप, लयबद्धता तथा गेयता संबंधी शिल्प की सराहना की | ..सहृदय आभार !


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