अंतर्नाद

मैंने स्वयं रचा, तुम्हारा अनुभूत सत्य, तुम्हारे लिए ...

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ओ, दसरथ माँझी !

Posted On: 11 Oct, 2015 Others,कविता में

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ओ, दसरथ माँझी !


ओ ! दसरथ माँझी, ओ ! दसरथ माँझी

जियरा तू पोढ़ कइलो दसरथ माँझी |


जाना उस पार बीचे बाटै पहाड़

काटौ पाथर-गरब अपार

हाथ-गोड़ लोह कइलो दसरथ माँझी |


सोनवा कै गाछ जग जतन के हाथ

छिनी-हथौड़, संकलपहि साथ

तुहुँ रहिया सोझ कइलो दसरथ माँझी |


जिनगी मोहताज घर मौनी-अनाज

सबसे बड़-खर पेट कै आग

मेहनत कोख कइलो दसरथ माँझी |


जनम रेहार करम कैसे न लिलार

करमहि बदलत जग-संसार

धुन आपन जोत कइलो दसरथ माँझी |


देसवा महान भारू तबहूँ परान

परबत-पौरुष मिले न दाम

कूवत से भोर कइलो दसरथ माँझी |


– संतलाल करुण



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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
October 17, 2015

देसवा महान भारू तबहूँ परान परबत-पौरुष मिले न दाम कूवत से भोर कइलो दसरथ माँझी | आदरणीय संतलाल करुण जी ! बहुत सुन्दर और प्रेरक रचना ! बहुत बहुत बधाई !

    Santlal Karun के द्वारा
    October 29, 2015

    आदरणीय सद्गुरु जी, उद्धरणपरक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

Shobha के द्वारा
October 13, 2015

श्री संत लाल जी बहुत दिनों बाद आपकी कविता देखने को मिली दशरथ मांझी के परिश्रम को सार्थक करती कविता भाषा भी भोजपुरी समझने में थोड़ी मुश्किल लगी|बहुत अच्छी रचना

    Santlal Karun के द्वारा
    October 29, 2015

    आदरणीया शोभा जी, श्लाघात्मक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
October 11, 2015

आदरणीय, आपने दशरथ मांझी की मेहनत और तपस्या को बहुत ही सुन्दर शब्दों में इस कविता में परोसा है…जिस तरह मांझी की मेहनत रंग लायी ठीक उसी तरह आपकी कविता में मांझी की कठोर मेहनत कि खुशबु इस कविता से आ रही है…दशरथ मांझी की छिनी- हथोड़े और आपकी कलम और रचनात्मकता में समान सी समानता है जो कि बहुत ही अदभुत है | अति सुन्दर कविता..

Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
October 11, 2015

आदरणीय, आपने दशरथ मांझी की मेहनत और तपस्या को बहुत ही सुन्दर शब्दों में इस कविता में परोसा है…जिस तरह मांझी की मेहनत रंग लायी ठीक उसी तरह आपकी कविता में मांझी की कठोर मेहनत कि खुशबु इस कविता से आ रही है…दशरथ मांझी की छिनी- हथोड़े और आपकी कलम और रचनात्मकता में समान सी समानता है जो कि बहुत ही अदभुत है | अति सुन्दर कविता….))

Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
October 11, 2015

आदरणीय, आपने दशरथ मांझी की मेहनत और तपस्या को बहुत ही सुन्दर शब्दों में इस कविता में परोसा है…जिस तरह मांझी की मेहनत रंग लायी ठीक उसी तरह आपकी कविता में मांझी की कठोर मेहनत कि खुशबु इस कविता से आ रही है…दशरथ मांझी की छिनी- हथोड़े और आपकी कलम और रचनात्मकता में समान सी समानता है जो कि बहुत ही अदभुत है | अति सुन्दर कविता….)))

    Santlal Karun के द्वारा
    October 29, 2015

    आदरणीया, रचना के प्रति आप की श्लाघात्मक प्रतिक्रिया से मन अभिभूत हो उठा; हार्दिक आभार !


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